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चलो कुछ ऐ 'बशर' ताज़ा सुनाओ
मिरी मुझ को सुना कर क्या करोगे
मिरी मुझ को सुना कर क्या करोगे
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आज कुछ घाइल परिंदों की दु'आओं में सुना है
आसमाँ चाहे न हो पर पाँव के नीचे ज़मीं हो
आसमाँ चाहे न हो पर पाँव के नीचे ज़मीं हो
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एक इतनी सी यार थी हसरत
एक दिन हम भी अपने घर जाते
एक दिन हम भी अपने घर जाते
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ख़ुश-गुमानी और मुरव्वत जो रखे वो
दिल तो दिल है, तुम वो सीने तोड़ डालो
सब फ़रेब-ओ-जौर वाले खेल खेलो
रब्त वाले सब क़रीने तोड़ डालो
तुम को क्या उस पार किस का है ठिकाना
सैर-ए-साहिल तुम सफ़ीने तोड़ डालो
इस्मत-ओ-इफ़्फ़त वक़ार-ओ-आबरू फिर
चाहे जिस का हाथ छीने तोड़ डालो
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नन्हा सा दिया घर में जो ख़ामोश पड़ा है
सोने दो उसे रात अँधेरों से लड़ा है
सोने दो उसे रात अँधेरों से लड़ा है
वो शख़्स जो शोहरत की बुलंदी पे खड़ा है
सुनते हैं कि उस शख़्स का व्यापार बड़ा है
इस दौर-ए-तनाफ़ुर में जो मसरूर बड़ा है
जज़्बात की कुचली हुई लाशों पे खड़ा है
तेशे ही फ़क़त बर-सर-ए-पैकार नहीं थे
इक शीशे का पैकर भी तो पत्थर से लड़ा है
फिर देखना ग़र्क़ाब न हो सोहनी कोई
रक्खा हुआ साहिल पे वहीं कच्चा घड़ा है
अहबाब से बारूद मिली प्यार के बदले
दुश्मन किसी दुश्मन पे अगर टूट पड़ा है
मुझ को तो नज़र आती नहीं कोई बड़ी बात
किस बात पे कहते हो मेरा शहर बड़ा है
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जाएज़ा लेता है फ़ज़ाओं का
हर परिंदा उड़ान से पहले
हर परिंदा उड़ान से पहले
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