nanha sa diya ghar men jo KHaamosh pada hai | नन्हा सा दिया घर में जो ख़ामोश पड़ा है

  - Dharmesh bashar

नन्हा सा दिया घर में जो ख़ामोश पड़ा है
सोने दो उसे रात अँधेरों से लड़ा है

वो शख़्स जो शोहरत की बुलंदी पे खड़ा है
सुनते हैं कि उस शख़्स का व्यापार बड़ा है

इस दौर-ए-तनाफ़ुर में जो मसरूर बड़ा है
जज़्बात की कुचली हुई लाशों पे खड़ा है

तेशे ही फ़क़त बर-सर-ए-पैकार नहीं थे
इक शीशे का पैकर भी तो पत्थर से लड़ा है

फिर देखना ग़र्क़ाब न हो सोहनी कोई
रक्खा हुआ साहिल पे वहीं कच्चा घड़ा है

अहबाब से बारूद मिली प्यार के बदले
दुश्मन किसी दुश्मन पे अगर टूट पड़ा है

मुझको तो नज़र आती नहीं कोई बड़ी बात
किस बात पे कहते हो मेरा शहर बड़ा है

  - Dharmesh bashar

Nazar Shayari

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