ये तमाशा नहीं अच्छा ये तमाशा न करो
ख़ुद को हर बात पे यूँँ आग बबूला न करो
ज़ेहन पर तारी मुसलसल ये अँधेरा है और
ये गुज़ारिश भी कि अब घर में उजाला न करो
बे-वफ़ा कह के उसे शहर में कर दें बदनाम
दिल ये मजबूर है कहता है कि ऐसा न करो
ग़म में दो लफ़्ज़ तसल्ली के तो कह सकते हैं
ख़ैर अब आप हमारे लिए इतना न करो
ख़ौफ़ रुसवाई का गर है तो भुला दो मुझको
नाम भी मेरा न लो ज़िक्र भी मेरा न करो
तीर खींचोगे मिरे दिल से तो मर जाऊँगा
बे-नियाज़ी से मिरे दर्द का चारा न करो
इस कड़ी धूप में है कौन किसी का साथी
अपने साए का भी इस वक़्त भरोसा न करो
हमने तो सोचा है अब तर्क-ए-तमन्ना का 'बशर'
दिल की चाहत है मगर तर्क-ए-तमन्ना न करो
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