Dharmesh bashar

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D Faldu bashar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in D Faldu bashar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

गरचे ख़ुदा-नुमा है कोई तो 'बशर' ही है बज़्म-ए-बुताँ में एक ही फ़नकार है 'बशर' — Dharmesh bashar
वुफ़ूर-ए-ग़म में भी कैफ़-ओ-नशात का आलम निज़ाम-ए-दहर में वजह-ए-सुरूर है कोई — Dharmesh bashar
तुझ से भी दूर ज़माने के तक़ाज़ों से भी दूर तेरा दीवाना ज़रा देख कहाँ जा निकला — Dharmesh bashar
है हमेशा बे-ख़बर जो लगे फिर भी मोतबर वो तिरे पास इतना दिल-कश तू बता ज़रा कोई है — Dharmesh bashar
वो कहाँ का आसमाँ था वो कहाँ की ख़ुल्द थी हूर-ओ-ग़िल्माँ थे बहुत पर आप सा कोई न था — Dharmesh bashar
फ़लसफ़ी था वो कभी अब तो 'बशर' शाइ'र है इस के अश'आर में वो बात न ढूँढ़े कोई — Dharmesh bashar
सभी को आता है कोई न कोई काम 'बशर' हर एक शख़्स मगर काम का नहीं होता — Dharmesh bashar
उसी के हाथ लगेगा सुराग़ हस्ती का जो अपनी ज़ात के ज़िंदाँ से दूर निकलेगा — Dharmesh bashar
बहार-ए-गुल को गुलिस्ताँ को गुल-जबीनों को ख़ुदा बचाए किसी चश्म-ए-बद से तीनों को — Dharmesh bashar
सुनाएँ क्या हम ये जानते हैं कि जी का बाक़ी सुकूँ लुटेगा हमारे नग़्मों पे रो पड़ेगा तुम्हारा हँसता गुलाब चेहरा — Dharmesh bashar
कहने को तो है हुस्न भी इन्साफ़ का क़ाइल ये सच है तो फिर चाहने वालों को कभी चाह — Dharmesh bashar
ये ज़िन्दगी तो हम को कभी की भुला चुकी अब क्या करें कि मौत भी आँखें चुराए है — Dharmesh bashar
मेरी क़िस्मत का सितारा है तो पेशानी पे आ कुछ न देंगी ये लकीरें हाथ से बाहर निकल — Dharmesh bashar
मिरा कलाम बराए-फ़रोख़्त है यारो सही से दाम लगाने बशर कोई तो आए — Dharmesh bashar
जीने मरने का मुहब्बत में बहुत फ़र्क़ है अब यार ये बात भी ग़ालिब को बताए कोई — Dharmesh bashar
वो बादलों की गरज थी कि बिजलियों की चमक वो जब ज़मीन पे उतरी तुम्हारी ज़ात हुई — Dharmesh bashar
जाने का वक़्त हो गया है अब 'बशर' चलो अस्बाब सारे छोड़ के कहते हैं अलविदा — Dharmesh bashar
इतना हो बस कि ग़ज़ल का भी रहे इक मेआ'र कैसे शाइ'र हैं जो इतना भी नहीं कर सकते — Dharmesh bashar
अब करूँँ कैसे मैं मंज़िल के न मिलने का गिला देख कर छाँव सर-ए-राह बशर बैठ गया — Dharmesh bashar
मैं आइने की तरह देखता रहा उस को वो मेरे सामने हँसता रहा सँवरता रहा — Dharmesh bashar

Ghazal

तुझ से रूठे तो कई रोज़ न ख़ुद से बोले बारहा तेरी ही यादों के दरीचे खोले तू भी ख़ामोश है तस्वीर भी तेरी ख़ामोश कोई तो बात करे कोई तो हम सेे बोले मेरी तख़’ईल मिरी ज़ात से आगे न बढ़ी तेरी आँखों ने कई भेद जहाँ के खोले मेरी तौफ़ीक़ भी कम है मिरी औक़ात भी कम क्या ज़रूरी है कि वो आँख मुझी को तोले आज की रात तो जी भर के हमें रोना हैं जिस को सोना है बड़े शौक़ से जाए सो ले हम ने तो रोज़ ही माँगी हैं दुआएँ लेकिन न कभी हाथ उठाए न कभी लब खोले ज़ौक़-ए-परवाज़ ही काफ़ी था उड़ानों के लिए न कभी पंख ये खोले न इरादे तोले मेरे बारे में भला मौत की मंशा क्या है सोचती होगी वो आए मिरा घूँघट खोले लोग मुश्ताक़ भी हैं गोश-बर-आवाज़ भी हैं क्यूँँ 'बशर’ ऐसे में अब कोई ज़बाँ को खोले — Dharmesh bashar
आ जा कि इज़्तिराब में है जाँ तिरे बग़ैर होता नहीं सुकून का सामाँ तिरे बग़ैर कहने को बे-शुमार नज़ारे हैं याँ मगर दुनिया दिखाई देती है वीराँ तिरे बग़ैर दिल-कश न रंग-ए-ग़ुंचा न पुर-कैफ़ बू-ए-गुल किस काम की है फ़स्ल-ए-बहाराँ तिरे बग़ैर जैसे किताब-ए-दहर पे इक हर्फ़-ए-ना-तमाम क्या है मिरा वजूद मिरी जाँ तिरे बग़ैर सब कुछ हो पास तू जो नहीं है तो कुछ नहीं ख़ाली है मेरे शौक़ का दामाँ तिरे बग़ैर जब तू मिला तो जैसे किनारा मिला मुझे थी ज़ीस्त एक मौज-ए-परेशाँ तिरे बग़ैर मंज़र तिरी जुदाई का अब भी है सामने थम सी गई है गर्दिश-ए-दौराँ तिरे बग़ैर ये मो'जिज़ा नहीं तो भला और क्या है फिर ज़िंदा हूँ आज भी मैं सनम हाँ तिरे बग़ैर ऐ जान-ए-शादमानी-ओ-इशरत चला भी आ हैं रंज-ओ-ग़म 'बशर' पे नुमायाँ तिरे बग़ैर — Dharmesh bashar
ऐ इश्क़ मैं कहाँ हूँ मुझे कुछ पता नहीं सर पर फ़लक नहीं है ज़मीं ज़ेर-ए-पा नहीं गर वो नहीं तो फिर कोई मेरा ख़ुदा नहीं कैसे कहूँ कि उस सेे कोई वास्ता नहीं अफ़सोस ये ठिकाना बहुत देर का नहीं ऐ दिल वगरना देख कि दुनिया में क्या नहीं हक़ अपना रखता हूँ मैं कभी माँगता नहीं जुरअत मिरे मिज़ाज में है इल्तिजा नहीं अब तक तो बे-नियाज़ी-ए-दुनिया का रंज था अब तू भी मेरा हाल कभी पूछता नहीं पहले भी दिल में दर्द उठा है बहार में एहसास कह रहा है कि ये ग़म नया नहीं मैं ने कहा कि तेरी निगाहों में क्या हूँ मैं उस ने कहा कि घर में तिरे आईना नहीं कश्ती पे लाख ज़ोर हो तूफ़ान पर कहाँ हम ना-ख़ुदा ज़रूर हैं लेकिन ख़ुदा नहीं है चारा-गर को वहम ख़ुदा होने का 'बशर' और इस जहाँ में वहम की कोई दवा नहीं — Dharmesh bashar
जिस दिन से तुझे देखा है अग़्यार के हमराह सीने से निकलती है तो बस आह फ़क़त आह उम्मीद-ए-करम तुझ से करें भी तो करें क्या जो चश्म-ए करम थी वो हुई जाती है जाँ-काह कहने को तो है हुस्न भी इन्साफ़ का क़ाइल ये सच है तो फिर चाहने वालों को कभी चाह मैं ख़ाक का पुतला हूँ तू मरमर का सनम है मैं तुझ सेे शनासा हूँ न तू मुझ सेे है आगाह गर्मी भी है ठंडक भी तलातुम भी सुकूँ भी क्या जानिए तू अस्ल में ख़ुर्शीद है या माह हम राह-ए-मुहब्बत के मुसाफ़िर भी अजब हैं मंज़िल थी बहुत पास मगर भूल गए राह हम तेरे सिवा और किसी बुत को तराशें दुश्मन है कोई जिस ने उड़ाई है ये अफ़वाह जब ज़िक्र छिड़ा मेरा तो आवाज़ ये आई इस दौर में ऐसे भी कोई होता है गुमराह मिसरा ही पढ़ा था कि 'बशर' बोल पड़े सब ऐ वाह मियाँ वाह मियाँ वाह मियाँ वाह — Dharmesh bashar
अब दिल भी अपने भेद हमीं से छुपाए है पूछे कोई कि क्यूँँ उसी काफ़िर पे आए है जब भी तिरी तलाश को निकले भटक गए है कोई रास्ता जो तिरे घर को जाए है दीवानगी-ए-शौक़ ने क्या हाल कर दिया अब तो निगाह-ए-नाज़ भी दामन बचाए है अब ख़ल्वतों में लुत्फ़-ए-तसव्वुर नहीं रहा अब तो ख़याल-ए-यार भी डर-डर के आए है अब शम'अ इंतिज़ार की हम तो बुझा चुके दिल फिर भी तेरी आस के दीपक जलाए है है जान इज़्तिराब में नब्ज़ें निढाल हैं वो कौन है जो दूर खड़ा मुस्कुराए है ये ज़िन्दगी तो हम को कभी की भुला चुकी अब क्या करें कि मौत भी आँखें चुराए है क्या बात है कि कोई किसी का नहीं रहा अब तो 'बशर' ये शहर भी पीछा छुड़ाए है — Dharmesh bashar
मैं राह-ए-शौक़ में थक कर जहाँ जहाँ ठहरा वहीं पे ही तिरी ज़ुल्फ़ों का कारवाँ ठहरा कोई बताए कि ये क़ाफ़िला-ए-जौर-ओ-सितम चला कहाँ से किधर को कहाँ कहाँ ठहरा ये दिल था रोज़-ए-अज़ल से अलामत-ए-हस्ती जो मर गया तो मिरी ज़ात का निशाँ ठहरा न आज जिस्म है बस में न रूह क़ब्ज़े में ज़हे-नसीब इसी रोज़ इम्तिहाँ ठहरा वो बर्क़-ओ-राद वो आँधी वो क़हर की बारिश जो ग़र्क़ हो के रहा मेरा आशियाँ ठहरा घनेरा साया हो बादल हो या के हो गेसू जो दे सुकून वही मेरा साएबाँ ठहरा उसी ने नज़रें चुराई रहा जो नूर-ए-नज़र उसी ने राज़ बिखेरे जो राज़-दाँ ठहरा तिरे जमाल को माना मगर ये क्या कम है तिरा 'बशर' भी तो सरताज-ए-आशिक़ाँ ठहरा — Dharmesh bashar
सब लोग पूछते हैं मुहब्बत में क्या मिला मैं क्या कहूँ कि यार मिला या ख़ुदा मिला रातों की नींद उड़ गई दिन का गया सुकूँ कुछ ऐसे बाँकपन से वो काफ़िर-अदा मिला कल तक सजी हुई थी जहाँ दिल की काइनात वाँ आज एक टूटा हुआ आइना मिला इक शौक़-ए-वस्ल था कि रहा महव-ए-जुस्तजू इक दर्द-ए-हिज्र था कि मुझे बारहा मिला फूलों की अंजुमन से कि तारों की बज़्म से क्या जाने किस मक़ाम से उस का पता मिला देखा उसे तो रूह पे मस्ती सी छा गई महसूस यूँँ हुआ कि कोई मय-कदा मिला मेरी दुआ यही है कि उस बुत की ख़ैर हो जिस के तुफ़ैल से मुझे मेरा ख़ुदा मिला वो देख कर 'बशर' की ये रीश-ए-दराज़ को बोला ख़ुदा का शुक्र है इक पारसा मिला — Dharmesh bashar
क़ातिल नहीं लगता कि मसीहा नहीं लगता इंसाफ़ से कहिए वो भला क्या नहीं लगता जब आँख में झाँकें तो कुछ अपना सा लगे है जब दिल को टटोलें तो फिर अपना नहीं लगता गुफ़्तार को देखें तो हमारी ही तरह है किरदार को देखें तो यहाँ का नहीं लगता ग़ैरों से उलझना तो ज़माने की हवा है अपनों से उलझना उसे ज़ेबा नहीं लगता कहने को तो याँ हुस्न के पैकर हैं हज़ारों पर इन में कोई भी तिरे जैसा नहीं लगता इस अंजुमन-ए-कैफ़ में आशिक़ भी बहुत हैं पर इन में कोई आशिक़-ए-यक्ता नहीं लगता वो शाइर-ए-गुमनाम जो गुज़रा है इधर से इस शहर में उस का कोई अपना नहीं लगता क्या सच में मुअय्यन है 'बशर' मौत का इक दिन ग़ालिब से कहो हम को तो ऐसा नहीं लगता अब वो भी दिल-आवेज़-ओ-दिल-आराम नहीं हैं और फिर भी 'बशर' सोज़-ए-तमन्ना नहीं लगता — Dharmesh bashar
किस सलीक़े से शब-ए-हिज्राँ सजा लेते हैं हम तू नहीं तो तेरी यादों को बुला लेते हैं हम दर्द-ए-दिल सोज़-ए-जिगर उफ़्तादगी-ए-जिस्म-ओ-जाँ बोझ भारी है मगर फिर भी उठा लेते हैं हम शाम-ए-ग़म को और भी रंगीं बनाने के लिए मय में कुछ ख़ून-ए-तमन्ना भी मिला लेते हैं हम हाल-ए-दिल अपना किसी पर क्या खुले कैसे खुले इक हँसी की आड़ में सौ ग़म छुपा लेते हैं हम साज़ के तारों से हम ने कुछ तो सीखा है सबक़ चोट जब पड़ती है दिल पर गुनगुना लेते हैं हम तेरे दर से जो भी मिल जाए मुबारक है हमें फूल हो या ख़ार सीने से लगा लेते हैं हम तेरी क़ुर्बत देख ली जल्वे भी तेरे चुन लिए अब इजाज़त हो तो अपना रास्ता लेते हैं हम ज़िंदगी भर तो 'बशर' हम राह में हाइल रहें आज तेरी राह से ख़ुद को हटा लेते हैं हम — Dharmesh bashar
हाल उस तरफ़ का जानना दुश्वार है बशर काफ़ी बुलन्द बीच की दीवार है बशर सर पर अजल खड़ी है कहाँ साया-ए-शजर समझे हो जिस को शाख़ वो तलवार है बशर जिस शख़्स से मिलोगे तमाशा दिखाएगा जो भी है इस नगर में कलाकार है बशर फिर ये सज़ा के ख़ौफ़ से घबरा रहे हो क्यूँँ तुम को तो अपने जुर्म का इक़रार है बशर अपनी ग़रज़ से मिलते हैं इक दूसरे से लोग कोई किसी का यार न ग़म-ख़्वार है बशर हीरा नहीं जो मोल बताते हुए फिरो कौन इस जहाँ में दिल का ख़रीदार है बशर होते यहाँ हैं जल्वा-ए-यूसुफ़ के सौदे भी दुनिया तमाम मिस्र का बाज़ार है बशर गरचे ख़ुदा-नुमा है कोई तो 'बशर' ही है बज़्म-ए-बुताँ में एक ही फ़नकार है 'बशर' — Dharmesh bashar
एक तमाशा है रिंदों का दौर है ये पैमानों का दुनिया जिस का नाम है वो है मयख़ाना मय-ख़ानों का ऐ उल्फ़त ये शोहरत है या बदनामी कुछ तू ही बता गर्म है इक बाज़ार ज़माने में मेरे अफ़सानों का दीदा-ए-तर उस के क़दमों में दौलत बर्बाद न कर मोल वो ज़ालिम क्या समझेगा मोती के इन दानों का दुनिया वालों ने अश्कों की बारिश को पानी समझा वो क्या जाने अस्ल में ये है ख़ून मिरे अरमानों का दूर रहो इस बीमारी से इस का कोई तोड़ नहीं इश्क़ दिलों का रोग है यारो इश्क़ है दुश्मन जानों का ये गाड़ी ये ऊँची कोठी ये धन दौलत आख़िर क्यूँँ इशरत के सामान सजाना काम नहीं मेहमानों का मैं भी कैसा दीवाना हूँ हैवानों की दुनिया में शमअ जलाए ढूँढ़ रहा हूँ एक नगर इंसानों का कौन सुनेगा शे'र तुम्हारे 'बशर' उठो महफ़िल से अब बज़्म-ए-ख़िरद में काम ही क्या है तुम जैसे दीवानों का — Dharmesh bashar
दिल को अब तक याद हैं आग़ाज़-ए-उल्फ़त के मज़े ख़ामुशी की लज़्ज़तें हर्फ़-ओ-हिक़ायत के मज़े छीनी-झपटी साअ'तों का लुत्फ़ हंगाम-ए-सहर शाम को बाहम दर-ओ-दीवार के छत के मज़े बारहा उन नीम-बाज़ आँखों में आँखें डाल कर हम को हासिल थे इसी दुनिया में जन्नत के मज़े ज़ेहन में महफ़ूज़ हैं काफ़िर अदाएँ हुस्न की दिल लिया करता था जिन के दम से ख़ल्वत के मज़े मरहबा वो आरज़ूएँ मरहबा वो वलवले जिन से वाबस्ता हैं तेरी मेरी सोहबत के मज़े कोसने वालों ने कोसा है मिज़ाज-ए-हुस्न को लूटने वालों ने लूटे हैं मुहब्बत के मज़े अहल-ए-दानिश सो रहे थे वादी-ए-इदराक में बस 'बशर' ही ले रहा था दश्त-ए-वहशत के मज़े — Dharmesh bashar
कोई हम-राज़ न निकला न शनासा निकला मैं भरी बज़्म में आ कर भी अकेला निकला वो ही तपता हुआ माहौल वो ही गर्द-ओ-ग़ुबार अब के ऐ दोस्त तिरा शहर भी सहरा निकला तुझ से भी दूर ज़माने के तक़ाज़ों से भी दूर तेरा दीवाना ज़रा देख कहाँ जा निकला मुद्दतों बा'द कहीं जा-ए-अमाँ पाई थी मैं जो पहुँचा तो तिरा इश्क़ वहीं आ निकला आज कुछ और ही अंदाज़ से तू याद आया दिल में तूफ़ान उठा आँख से दरिया निकला वो दिखाई भी दिया तो पस-ए-चिलमन यारो चाँद निकला तो मगर यार अधूरा निकला आसमानों में भी इक हूक उठेगी जैसे शोर सीने से मिरे कोई अभी निकला, निकला थी जहाँ शम'अ वहाँ ख़ाक है परवाने की क्या भला इश्क़ जताने का नतीजा निकला उम्र भर जिस की ख़ुदाई मिरा ईमान रही ग़ौर से देखा तो इक ख़ाक का पुतला निकला सुन 'बशर' पहले भी इस खेल के माहिर थे कई कोई 'ग़ालिब', कोई 'मोमिन', कोई 'इंशा' निकला — Dharmesh bashar
फिर इसी बज़्म में ले आए हैं देखे कोई बात मेरी न सुने कोई न समझे कोई सुब्ह हो ज़ुहर हो या शाम कि हो नीम शबी घर का दरवाज़ा खुला रक्खो कि आए कोई बे-यक़ीनी से कोई मेरा सरापा देखे हो के हैरान मिरी आँख में झाँके कोई मेरी नज़रों से मिरे दिल का धड़कना जाँचे अपनी नज़रों से मिरी नब्ज़ टटोले कोई बन के तस्वीर मेरे सामने कुछ यूँँ बैठे मेरे काबे को सनम-ख़ाना बना दे कोई रौशनी बन के मिरे दिल को मुनव्वर कर दे बन के ख़ुशबू मिरे अन्फ़ास में महके कोई बन के शो'ला मिरे एहसास को बे-दार करे बन के नग़्मा मिरे अफ़कार में गूँजे कोई हाथ पर दिल न रखा और न गिरा फिर भी 'बशर' सीने को तोड़ के दिल 'कैफ़' का तोड़े कोई फ़लसफ़ी था वो कभी अब तो 'बशर' शाइ'र है इस के अश'आर में वो बात न ढूँढ़े कोई — Dharmesh bashar
आए हो तो बैठो न करो जाने की बातें अच्छी नहीं अपनों पे सितम ढाने की बातें तुम आँख उठा कर ज़रा देखो तो मिरी जाँ है कोई जो छेड़े यहाँ मय-ख़ाने की बातें हम ने तो सनम तुम को यूँँ पूजा है कि हरदम का'बे में भी होती हैं सनम-ख़ाने की बातें तुम शो'ला-ब-दामाँ हो जिगर सोख़्ता हम हैं वो शम'अ की बातें हैं ये परवाने की बातें मत पूछो कि क्या हाल हुआ तुम सेे बिछड़ कर अब याद नहीं तुम सेे बिछड़ जाने की बातें हम जैसे थे वैसे ही हैं वैसे ही रहेंगे करने दो जो करते हैं बदल जाने की बातें कलियों से सुने थे तिरे शर्माने के क़िस्से भँवरों से सुनी हैं तिरे खुल जाने की बातें तारों में नज़र आए तिरी आँख-मिचौली मौजों ने सुनाईं तिरे बल-खाने की बातें रह जाओ अगर पास हमारे किसी सूरत मर जाए जो छेड़े कभी मर जाने की बातें अग़्यार की महफ़िल में न जाया करो जानाँ वाँ सिर्फ़ हुआ करती हैं बहकाने की बातें सुननी हैं तो फिर सुनिए 'बशर' की ही ज़बाँ से फ़र्ज़ाने की बातें हों कि दीवाने की बातें — Dharmesh bashar
हम-सफ़र लाखों थे लेकिन रहनुमा कोई न था मंज़िलें चारों तरफ़ थीं रास्ता कोई न था बहर-ए-ग़म का हाल हम किस से कहें कैसे कहें कश्तियाँ ही कश्तियाँ थीं ना-ख़ुदा कोई न था मंदिरों में जितने बुत थे सब के सब बे-जान थे मस्जिदों में भी मगर यारो ख़ुदा कोई न था मोमिनों की बात छोड़ो मुनकिरों को भूल जाओ मैं जहाँ पर था वहाँ मेरे सिवा कोई न था वो कहाँ का आसमाँ था वो कहाँ की ख़ुल्द थी हूर-ओ-ग़िल्माँ थे बहुत पर आप सा कोई न था मुझ को कल बैठे-बिठाए ले गया कोई कहाँ जानने वाले बहुत थे आश्ना कोई न था हम-निवाला हम-पियाला हम-तरीक़त हम-लिबास ये तो सब मौजूद थे पर हम-नवा कोई न था उस हुजूम-ए-नाज़ में यूँँ तो कई बहनाज़ थे जिस पे दिल आ जाए ऐसा दिल-रुबा कोई न था कल तिरी महफ़िल में रौनक़ भी थी वीरानी भी थी वाँ 'बशर' तो था मगर ग़म-आश्ना कोई न था — Dharmesh bashar
हमारे सर से कुछ ऐसे भी इम्तिहाँ गुज़रे हमें ख़ुद अपनी हक़ीक़त पे सौ गुमाँ गुज़रे हम इस जहान में ठहरे तो ला-मकाँ बन कर हम इस जहान से गुज़रे तो बे-निशाँ गुज़रे तुम्हारी याद के नश्तर चले जो सीने पर तो मेरी रात भला कैसे जान-ए-जाँ गुज़रे तिरी गली से जो गुज़रे तो इस तरह गोया सलीब उठाए हुए कोई नीम-जाँ गुज़रे बस इक ज़मीं न मिली राह-ए-शौक़ में वर्ना हमारे पास से कितने ही आसमाँ गुज़रे हरम न दैर सलामत न मय-कदा महफ़ूज़ जो कू-ए-यार से गुज़रे तो बे-अमाँ गुज़रे महाज़-ए-इश्क़ में क्या क्या न देखा हम ने सनम हमारे पेश-ए-नज़र लश्कर-ए-गिराँ गुज़रे कुछ ऐसे ज़ख़्म हैं जिन की हमें तवक़्क़ो थी कुछ ऐसे ज़ख़्म हैं जो हम पे ना-गहाँ गुज़रे रह-ए-क़रार में कैसे नसीब हो मंज़िल क़दम बशर के सफ़र में यहाँ वहाँ गुज़रे दुआ 'बशर' की है इतनी कि उस की हर सा'अत नज़र-नवाज़ हसीनों के दरमियाँ गुज़रे — Dharmesh bashar
बला से दिन तो ढला शुक्र है कि रात हुई ग़म-ए-हयात से थोड़ी बहुत नजात हुई ये ज़िंदगी के तक़ाज़े ये मौत की दस्तक हमारी ज़ात पे क्या क्या न वारदात हुई ज़ियादा-तर तो मैं ख़ुद से ही हम-कलाम रहा कभी कभी तो मगर आप से भी बात हुई ये दिल-ख़राश से तेवर ये ख़श्म-गीं आँखें मुझे बचाओ कि फिर चश्म-ए-इल्तिफ़ात हुई वो बादलों की गरज थी कि बिजलियों की चमक वो जब ज़मीन पे उतरी तुम्हारी ज़ात हुई शब-ए-विसाल है और तिश्ना लब है रिंद कोई कोई बताए भला ये भी कोई बात हुई वो ख़ामुशी के तराने वो रक़्स-ए-तन्हाई शब-ए-फ़िराक़ मिरी मुद्दत-ए-हयात हुई तू बात बात में जन्नत की बात करता है तो फिर बता कभी तेरी ख़ुदा से बात हुई तू आज आया ‘बशर’ की मिज़ाज-पुर्सी को तुझे ख़बर है कि अर्सा हुआ वफ़ात हुई — Dharmesh bashar

Nazm

"खिलौना" तुम को इस दिल से शिकायत थी कि बेकार है ये हर हसीना की मुहब्बत का गिरफ़्तार है ये हुस्न के फ़ैज़ का हर वक़्त तलब-गार है ये दौड़ते फिरता है पर अस्ल में बीमार है ये हम को अच्छी नज़र आती नहीं हालत इस की जाओ और जल्द करा लाओ मरम्मत इस की सुन के ये हुक्म सर-ए-शौक़ झुकाया मैं ने दिल-ए-बीमार तबीबों को दिखाया मैं ने हाल-ए-ना-साज़ ब-तफ़सील सुनाया मैं ने उस के फ़रमानों को सीने से लगाया मैं ने बोले इस दिल से तुम्हें हाथ न धोने देंगे इक जवाँ-साल को मरहूम न होने देंगे देखते देखते तख़्ते पे लिटाया मुझ को फिर हदफ़ अपनी जराहत का बनाया मुझ को आलम-ए-ख़्वाब में क्या क्या न सताया मुझ को होश आ जाने पे मुज्दा ये सुनाया मुझ को आप के पहलू में अब एक दिल-ए-कामिल है जिस के औसाफ़-ए-हमीदा का बयाँ मुश्किल है साज़ कहिए तो हर इक तार है उम्दा इस का आईना कहिए तो हर अक्स है उजला इस का है खिलौना तो हर इक खेल अनोखा इस का गोया हर रंग ज़माने से निराला इस का ख़ंदा-पेशानी से तुम साथ इसे ले जाओ जिन को शिकवा था उन्हें खोल के दिल दिखलाओ जान-ए-मन ये रहा वो दिल ज़रा देखो इस को कोई शक हो तो बड़े शौक़ से परखो इस को है नई चीज़ नए ढंग से जाँचो इस को जी को भा जाए तो फिर प्यार से थामो इस को आप के हाथ से नागाह अगर छूट गया इक खिलौना ही तो है टूट गया टूट गया — Dharmesh bashar
"तस्वीर-कशी" जाँ अब तिरी तस्वीर में जो आने लगी है गुल-पोश हसीं शाम को बहकाने लगी है तस्वीर तिरी दिल मिरा बहलाने लगी है उजड़े हुए गुलज़ार को महकाने लगी है मैं बात जो करता था तो हो जाती थी नाराज़ अब आँख झुका लेती है शर्माने लगी है जो मुझ से लगातार बचाती रही नज़रें अब मुझ पे नज़र डाल के मुस्काने लगी है जो हाथ लगाने पे रहा करती थी ख़ामोश अब शे'र सुनाती है ग़ज़ल गाने लगी है मैं इस की अदाओं पे रहा मस्त हमेशा अब ये मिरे अश'आर पे लहराने लगी है जो प्यार के लम्हात तिरे साथ गुज़ारे तस्वीर तिरी बारहा दोहराने लगी है कल तक जो बनी रहती थी दीवार की ज़ीनत अब दिल के हर इक गोशे को गरमाने लगी है आँखों में मिरी देख के तस्वीर ख़ुद अपनी क्या जानिए किस बात पे इतराने लगी है सीने को ढके रखता था जो रेशमी आँचल दो चार दिनों से उसे सरकाने लगी है इक रोज़ इसे यूँँ ही कहीं छेड़ दिया था ये मुझ को उसी रोज़ से उकसाने लगी है अब इस पे भी कुछ रंग तिरा चढ़ने लगा तो बल खा के मिरे सामने इठलाने लगी है ग़लती से जो है देख ली तस्वीर कोई और मुरझा के अब इस तरह वो ग़म खाने लगी है कल रात 'बशर' हम ने जो शाने को हिलाया कहने लगी सो जाओ कि नींद आने लगी है — Dharmesh bashar
दुहाई ख़ुदा करे कि शब-ए-वस्ल रास आए तुझे हमारी तरह गले से कोई लगाए तुझे तिरी निगाह से छुप कर तिरे ही कानों में जो बात हम ने कही थी वही सुनाए तुझे मज़ा तो जब है कि वो बे-ख़ुदी के आलम में हमारे शे'र पढ़े और गुदगुदाए तुझे हमारे तर्ज़-ए-तकल्लुम की चाशनी ले कर समाअतों को तिरी चू में और लुभाए तुझे इसी मिज़ाज से ले कर शुऊर-ए-इश्क़ कभी हमारे साँचे में ढल जाए और रिझाए तुझे तू रूठ जाए तो उस के दिल-ओ-जिगर काँपें रुँधी ज़बान से क़स में भरे मनाए तुझे तू उस की आँख में झाँके तो हम ही आएँ नज़र फिर ऐसे वक़्त में क्या कुछ न याद आए तुझे मगर जो ज़िक्र हमारा छिड़े तो चुप रहना जतन वो लाख करे पर पकड़ न पाए तुझे मिले कभी तो 'बशर' बे-समझ को समझाना जुनून-ए-इश्क़ भुला कर वो भूल जाए तुझे — Dharmesh bashar
"तलाश-ए-हक़" तलाश-ए-हक़ है गर तुझ को नज़र को तीरों के रुख़ पर लगा दे तू हदफ़ को देख दुनिया के उसे पहचान उस की जुस्तजू में रात-दिन लग जा तुझे हक़ भी मिलेगा उस तलक जाने का रस्ता भी मगर वो रास्ता चुन ले तो फिर तो ज़ख़्म खाने को जिगर भी साथ ले आना सितम पर मुस्कुराने का हुनर भी साथ ले आना यही है इंतिहा उस की यही अंजाम होता है कि इस रस्ते पे चलने का यही ईनाम होता है मगर इस रास्ते पर ज़ख़्म खाने का मज़ा कुछ और है सुन ले यहाँ पर जान देने की जज़ा कुछ और है सुन ले अगर तू अज़्म कर ले बस ज़रा सा हौसला कर ले तो फिर कल क्या पता जब फिर कोई हक़ का हो जोइंदा निशाँ रस्ते लहू के तेरे कोई नक़्श-ए-पा कर ले कि ये दुनिया तो फ़ानी है ये जाँ तो यूँँ भी जानी है तलाश-ए-हक़ है गर तुझ को नज़र को तीरों के रुख़ पर लगा दे तू — Dharmesh bashar
'गदागर' कल सड़क पर इक गदागर दफ़'अतन जो दिख गया चंद सिक्के भीक देकर मैं ने उस सेे ये कहा भाई तुम मर्ज़ी के अपनी मालिक-ओ-मुख़्तार हो इक गुज़ारिश है मगर जो सुनने को तैयार हो दौर-ए-पीरी है मगर आ'ज़ा तो चलते हैं अभी भीक में ज़िल्लत है ढूँढो काम धंधा तुम कोई हाथ फैलाना किसी के सामने अच्छा नहीं तुम सेे सालिम शख़्स पर पेशा ये कुछ जँचता नहीं एक ठंडी आह भर कर मुस्कुराया वो ज़रा चंद लम्हे सोच कर कुछ उस ने बोला साहिबा किस को है मर्ज़ी पे अपनी इस जहाँ में इख़्तियार मैं ने कब चाहा था हो पामाल यूँँ मेरा वक़ार मैं हुनर रखता था साहिब मैं भी इक फ़नकार था और फ़न मेरा फ़ुनूस-ए-ख़ास का सरदार था शे'र कहता था ग़ज़ब के नाम था हर सू मिरा सुनने वालों पे चला करता था क्या जादू मिरा शोहरत-ओ-इज़्ज़त भी थी और ज़र भी था हासिल मुझे ज़िन्दगी लगती थी मिस्ल-ए-नेमत-ए-कामिल मुझे फिर हुआ कुछ यूँँ कि ये दुनिया मशीनी हो गई और शे'र-ओ-नग़मा की रफ़्तार धीमी हो गई अब नहीं सजतीं कहीं शे'र-ओ-सुख़न की महफ़िलें अब कहाँ वो लोग जो ग़ज़लें सुने नज़्में सुने शा'इरी में अब किसी इंसाँ को दिलचस्पी कहाँ अब तो ये फ़न हो चुका है एक भूली दास्ताँ मेरी मुश्किल है कि मैं ने और कुछ सीखा नहीं उम्र के इस दौर में वैसे भी कुछ होता नहीं या'नी मुझ जैसे तो अब के वक़्त में बेकार हैं माँगते हैं भीक हाँ बेहद ज़लील-ओ-ख़्वार हैं — Dharmesh bashar
"आसमानी ख़्वाब" ये भी इक नेमतों में नेमत है आदमी ख़्वाब देख सकता है या'नी दुनिया के रंज से थक कर नींद के मख़मली से बिस्तर पर अपनी दुनिया से मीलों दूर कहीं नई दुनिया फरोल सकता है हाँ मगर ख़्वाब हैं कई सारे ख़्वाब झूटे भी ख़्वाब सच्चे भी ख़्वाब बदतर हैं ख़्वाब अच्छे भी कुछ तो हैं ख़्वाब कच्ची नींदों के कुछ हैं गहराइयों में डूबे हुए उन में कुछ हैं फ़ुज़ूल बे-बुनियाद और कुछ क़ीमती हैं हीरों से कुछ में उम्मीद साफ़ दिखती है यार की दीद साफ़ दिखती है कुछ धुँदलकों में डूबे हैं जैसे किसी देरीना इश्क़ के बिल-अक्स लूट जाने का दर्स देते हैं फिर न आने का दर्स देते हैं मैं सुनाता हूँ इक निशानी ख़्वाब ख़्वाब था एक आसमानी ख़्वाब मैं ने देखा कि मर गया हूँ मैं और फिर से उठाया जा चुका हूँ एक मैदान है अदालत का मैं कटहरे में लाया जा चुका हूँ मुज़्तरिब हूँ मगर डरा हुआ सा ख़ौफ़ से जिस्म है मरा हुआ सा सामने ज़िंदगी का ख़ाका है इसी अस्ना में आसमाँ से कहीं एक आवाज़ गूँजती है वहाँ ये फ़ुलाँ है न और इब्न-ए-फ़ुलाँ इस से पूछो कहाँ से आया है कौन सी चीज़ साथ लाया है मैं ने रोते में गिड़गिड़ाते में इतना सा कह दिया कि मेरे रब तू नहीं था तो मैं ने दुनिया में तेरे बंदों से बस मुहब्बत की फिर से आवाज़ गूँजती है वहाँ मेरा बंदा है ये जो इब्न-ए-फ़ुलाँ इस से कह दो कि उस को बख़्श दिया — Dharmesh bashar
"सौदाई" अजब दिल है न जीता है न मरता है न सीने में ठहरता है न बाहर ही निकलता है अजब जाँ है तरसती है कि तू आए झिझकती है कि तू आए तो ना-मालूम क्या होगा परेशाँ है कि दुनिया क्या कहेगी पशेमाँ है कि अपने बा-हमी रिश्ते में वो दम है न वो ख़म है मगर फिर भी बिलखती है कि तन्हाई ने ऐसा मार रक्खा है न तू आई तो मेरा क्या बनेगा अजब तू है न अपनों में न ग़ैरों में न ग़म-अंदोज़ ख़ल्वत में न जाँ-अफ़रोज़ जल्वत में मुझे डर है कि तुझ सेे मेल होगा तो कहाँ होगा किसी सर-सब्ज़ वादी में के इस वीरान कुटिया में इसी दुनिया में या फिर सरहदों के पार उक़्बा में अजब मैं हूँ मुफ़क्किर भी मुहक़्क़िक़ भी मुसन्निफ़ भी मगर अफ़सोस आशिक़ भी गया-गुज़रा सा शाइ'र भी बईद-अज़-अक़्ल भी और रस्म-ए-दुनिया से भी बे-गाना जो अनजाने में तुझ सेे ढेर सारा प्यार कर बैठा ब-हर-सूरत अगर कुछ वाक़िया है तो फ़क़त ये है मिरा दिल तुझ पे शैदा है मिरी जाँ तुझ पे वारी है मगर फिर भी ये हसरत है कि कोई मरहम-ए-दिल दिल को समझाए कोई गिरवीदा-ए-जाँ जाँ को बतलाए कि तू इक पैकर-ए-दिलकश नहीं है एक नागन है जो अपनों ही को डसने के लिए बेताब रहती है ये सब कुछ जान कर भी मैं तिरे इन गेसुओं के पेच-ओ-ख़म का सिर-फिरा क़ैदी तड़पता रहता हूँ मैं इस लिए शायद के तू आए तू आ कर मुझ को पहले की तरह दोबारा डस जाए — Dharmesh bashar