हौसला जब दिल के अन्दर हो गया
यूँँ लगा ज़र्रा भी अख़्तर हो गया
पाँव के छाले भी अब दुखते नहीं
अब ये सहरा ही मुक़द्दर हो गया
कहकशाँ की सैर को निकला मगर
अपने ही घर से मैं बेघर हो गया
हुस्न जब निखरा तो रंग-ए-इश्क़ भी
और बेहतर और बेहतर हो गया
दिल में छाया ही था कुछ उसका ख़याल
ख़ुशनुमा कैसा ये मंज़र हो गया
जब पड़ी उस पर अक़ीदत की नज़र
देवता जैसा वो पत्थर हो गया
उसने भी उम्मीद मुझ सेे छोड़ दी
अब हिसाब अपना बराबर हो गया
कौन गुज़रा है 'बशर' उस राह से
एक इक ज़र्रा मुनव्वर हो गया
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