hausla jab dil ke andar ho gaya | हौसला जब दिल के अन्दर हो गया

  - Dharmesh bashar

हौसला जब दिल के अन्दर हो गया
यूँँ लगा ज़र्रा भी अख़्तर हो गया

पाँव के छाले भी अब दुखते नहीं
अब ये सहरा ही मुक़द्दर हो गया

कहकशाँ की सैर को निकला मगर
अपने ही घर से मैं बेघर हो गया

हुस्न जब निखरा तो रंग-ए-इश्क़ भी
और बेहतर और बेहतर हो गया

दिल में छाया ही था कुछ उसका ख़याल
ख़ुशनुमा कैसा ये मंज़र हो गया

जब पड़ी उस पर अक़ीदत की नज़र
देवता जैसा वो पत्थर हो गया

उसने भी उम्मीद मुझ सेे छोड़ दी
अब हिसाब अपना बराबर हो गया

कौन गुज़रा है 'बशर' उस राह से
एक इक ज़र्रा मुनव्वर हो गया

  - Dharmesh bashar

Musafir Shayari

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