हम आज़मा चुके हैं ज़माना फ़ुज़ूल है
अब राज़-ए-ग़म किसी को बताना फ़ुज़ूल है
फिर दिल पे कोई चोट लगाना फ़ुज़ूल है
वक़्त-ए-फ़िराक़ 'इश्क़ जताना फ़ुज़ूल है
दिलकश समाँ है और जो भीगी हुई ये रात
ऐसे में हम से रूठ के जाना फ़ुज़ूल है
हम हैं दिवाने आपका दामन न थाम लें
राहों में हम सेे नज़रें चुराना फ़ुज़ूल है
वो दिल नहीं रहा वो तमन्ना नहीं रही
नज़रों से अब ये तीर चलाना फ़ुज़ूल है
वो चारा-साज़ है तो वो मरहम अता करे
क़ातिल को दिल के ज़ख़्म दिखाना फ़ुज़ूल है
ये दास्तान अब कोई सुनता नहीं यहाँ
रूदाद-ए-इश्क़ अब तो सुनाना फ़ुज़ूल है
हम शाइरी भी करने लगे हैं तो फिर 'बशर'
अब यार उसका लौट के आना फ़ुज़ूल है
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