"तलाश-ए-हक़"

तलाश-ए-हक़ है गर तुझ को
नज़र को तीरों के रुख़ पर लगा दे तू
हदफ़ को देख दुनिया के
उसे पहचान उस की जुस्तजू में रात-दिन लग जा
तुझे हक़ भी मिलेगा उस तलक जाने का रस्ता भी
मगर वो रास्ता चुन ले
तो फिर तो ज़ख़्म खाने को जिगर भी साथ ले आना
सितम पर मुस्कुराने का हुनर भी साथ ले आना
यही है इंतिहा उस की यही अंजाम होता है
कि इस रस्ते पे चलने का यही ईनाम होता है
मगर इस रास्ते पर ज़ख़्म खाने का मज़ा कुछ और है सुन ले
यहाँ पर जान देने की जज़ा कुछ और है सुन ले
अगर तू अज़्म कर ले बस ज़रा सा हौसला कर ले
तो फिर कल क्या पता जब फिर कोई हक़ का हो जोइंदा
निशाँ रस्ते लहू के तेरे कोई नक़्श-ए-पा कर ले
कि ये दुनिया तो फ़ानी है
ये जाँ तो यूँ भी जानी है
तलाश-ए-हक़ है गर तुझ को
नज़र को तीरों के रुख़ पर लगा दे तू

— Dharmesh bashar

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