हमारे सर से कुछ ऐसे भी इम्तिहाँ गुज़रे

हमें ख़ुद अपनी हक़ीक़त पे सौ गुमाँ गुज़रे

हम इस जहान में ठहरे तो ला-मकाँ बन कर
हम इस जहान से गुज़रे तो बे-निशाँ गुज़रे

तुम्हारी याद के नश्तर चले जो सीने पर
तो मेरी रात भला कैसे जान-ए-जाँ गुज़रे

तिरी गली से जो गुज़रे तो इस तरह गोया
सलीब उठाए हुए कोई नीम-जाँ गुज़रे

बस इक ज़मीं न मिली राह-ए-शौक़ में वर्ना
हमारे पास से कितने ही आसमाँ गुज़रे

हरम न दैर सलामत न मय-कदा महफ़ूज़
जो कू-ए-यार से गुज़रे तो बे-अमाँ गुज़रे

महाज़-ए-इश्क़ में क्या क्या न देखा हम ने सनम
हमारे पेश-ए-नज़र लश्कर-ए-गिराँ गुज़रे

कुछ ऐसे ज़ख़्म हैं जिन की हमें तवक़्क़ो थी
कुछ ऐसे ज़ख़्म हैं जो हम पे ना-गहाँ गुज़रे

रह-ए-क़रार में कैसे नसीब हो मंज़िल
क़दम बशर के सफ़र में यहाँ वहाँ गुज़रे

दुआ 'बशर' की है इतनी कि उस की हर सा'अत
नज़र-नवाज़ हसीनों के दरमियाँ गुज़रे

— Dharmesh bashar

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