बे-मौसमी बारिश से न घबराएँ मुसाफ़िर
बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर चलते चले जाएँ मुसाफ़िर
क्यूँँ बरपा है ग़ुल-शोर यहाँ शहर में आख़िर
जाना हैं तो चुपचाप चले जाएँ मुसाफ़िर
तारीकी यहाँ ख़त्म कभी हो नहीं सकती
सूरज या सितारे जो भी ले आएँ मुसाफ़िर
सुनसान सराए न ही मंज़िल की ख़बर अब
दरपेश अज़िय्यत है जिधर जाएँ मुसाफ़िर
ये सोच के घर पर कोई ताला नहीं डाला
शायद किसी इक शाम पलट आएँ मुसाफ़िर
अस्बाब-ए-सफ़र लुट चुका है सारे का सारा
अब दस्त-ए-दुआ आज़मा के जाएँ मुसाफ़िर
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