
अब भी कुछ ऐसे हैं गुलज़ार पुराने बाक़ी
सामने जिन के है कम ताज़ा गुलाबों की महक
सुन लिए कुहना तराने जो किसी बुलबुल के
शोर से कम न लगेगी ये परिंदों की चहक
— Dharmesh bashar
Other sher from the same pen
Shers of masti.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling