तमाम रात जो दर पर ख़ुदा के रक़्स किया
ख़मोशी से तो कभी गुनगुना के रक़्स किया
वो और लोग हैं जिनको अज़ीज़ है दुनिया
तिरे फ़क़ीर ने दुनिया लुटा के रक़्स किया
शब-ए-फ़िराक़ कोई दोस्त भी नहीं आया
गले से ख़ुद को लगाया लगा के रक़्स किया
जुदाई का भी असर था मगर मिरे दिल ने
तिरे ख़याल की महफ़िल सजा के रक़्स किया
दयार-ए-यार से मुझको बड़ी अक़ीदत है
दयार-ए-यार में सर को झुका के रक़्स किया
कोई निशाँ न रहे कमरे में मुहब्बत का
सो मैंने तेरे सभी ख़त जला के रक़्स किया
तमाम रात सितारों को ये ख़बर न हुई
'बशर' ने चाँद को शबभर जगा के रक़्स किया
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