tamaam raat jo dar par KHuda ke raqs kiya | तमाम रात जो दर पर ख़ुदा के रक़्स किया

  - Dharmesh bashar

तमाम रात जो दर पर ख़ुदा के रक़्स किया
ख़मोशी से तो कभी गुनगुना के रक़्स किया

वो और लोग हैं जिनको अज़ीज़ है दुनिया
तिरे फ़क़ीर ने दुनिया लुटा के रक़्स किया

शब-ए-फ़िराक़ कोई दोस्त भी नहीं आया
गले से ख़ुद को लगाया लगा के रक़्स किया

जुदाई का भी असर था मगर मिरे दिल ने
तिरे ख़याल की महफ़िल सजा के रक़्स किया

दयार-ए-यार से मुझको बड़ी अक़ीदत है
दयार-ए-यार में सर को झुका के रक़्स किया

कोई निशाँ न रहे कमरे में मुहब्बत का
सो मैंने तेरे सभी ख़त जला के रक़्स किया

तमाम रात सितारों को ये ख़बर न हुई
'बशर' ने चाँद को शबभर जगा के रक़्स किया

  - Dharmesh bashar

Andhera Shayari

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