हुस्न था या कमाल सा कुछ था
'इश्क़ था या बवाल सा कुछ था
ख़्वाब हम उसको कह नहीं सकते
यूँँ ही बस इक ख़याल सा कुछ था
मिट न पाया हज़ार कोशिश से
दिल के शीशे में बाल सा कुछ था
उसको सब हादसा समझ बैठे
दिल को इस पर मलाल सा कुछ था
मिल न पाता जवाब जिसका अब
कू-ब-कू वो सवाल सा कुछ था
ध्यान आया पहुँच के पिंजरे में
साथ दोनों के जाल सा कुछ था
नाचता फिर रहा बगूले सा
बस्तियों में अकाल सा कुछ था
कर गया वो उथल-पुथल सबको
वो मुक़द्दर की चाल सा कुछ था
एक औघड़ था जिसके हाथों में
हमने देखा कपाल सा कुछ था
जब अँधेरों को चीरकर देखा
उनके अंदर मशाल सा कुछ था
मसअले जिनके हों वजूद नहीं
बस उन्हीं पर बवाल सा कुछ था
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