नन्हा सा दिया घर में जो ख़ामोश पड़ा है
सोने दो उसे रात अँधेरों से लड़ा है
वो शख़्स जो शोहरत की बुलंदी पे खड़ा है
सुनते हैं कि उस शख़्स का व्यापार बड़ा है
इस दौर-ए-तनाफ़ुर में जो मसरूर बड़ा है
जज़्बात की कुचली हुई लाशों पे खड़ा है
तेशे ही फ़क़त बर-सर-ए-पैकार नहीं थे
इक शीशे का पैकर भी तो पत्थर से लड़ा है
फिर देखना ग़र्क़ाब न हो सोहनी कोई
रक्खा हुआ साहिल पे वहीं कच्चा घड़ा है
अहबाब से बारूद मिली प्यार के बदले
दुश्मन किसी दुश्मन पे अगर टूट पड़ा है
मुझको तो नज़र आती नहीं कोई बड़ी बात
किस बात पे कहते हो मेरा शहर बड़ा है
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