jab charaagon ko tajalli ka nasha ho jaa.e | जब चराग़ों को तजल्ली का नशा हो जाए

  - Dharmesh bashar

जब चराग़ों को तजल्ली का नशा हो जाए
दिल से फिर ख़ौफ़ हवाओं का हवा हो जाए

मोतबर इतना मिरा दस्त-ए-दुआ हो जाए
जो दुआ माँगूँ तो मंज़ूर-ए-ख़ुदा हो जाए

याद-ए-माज़ी के समंदर पे धुआँ सा क्यूँँ है
फिर कहीं दर्द का बादल न घना हो जाए

बारहा आह मिरी गुम हो ख़लाओं में यूँँ
ज्यूँ अँधेरों में कोई साया फ़ना हो जाए

ग़र्क़ कर के ही रहेगा ये सफ़ीने का शिगाफ़
चाहे कितनी भी मुआफ़िक़ ये हवा हो जाए

मौत आई है निजात-ए-ग़म-ए-हस्ती देने
जान दे दूँ तो मिरा हक़ भी अदा हो जाए

इस क़दर ज़ीस्त से बेज़ार हुआ हूँ मैं 'बशर'
ज़हर भी दे कोई मुझको तो दवा हो जाए

  - Dharmesh bashar

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