दिल को अब तक याद हैं आग़ाज़-ए-उल्फ़त के मज़े

ख़ामुशी की लज़्ज़तें हर्फ़-ओ-हिक़ायत के मज़े

छीनी-झपटी साअ'तों का लुत्फ़ हंगाम-ए-सहर
शाम को बाहम दर-ओ-दीवार के छत के मज़े

बारहा उन नीम-बाज़ आँखों में आँखें डाल कर
हम को हासिल थे इसी दुनिया में जन्नत के मज़े

ज़ेहन में महफ़ूज़ हैं काफ़िर अदाएँ हुस्न की
दिल लिया करता था जिन के दम से ख़ल्वत के मज़े

मरहबा वो आरज़ूएँ मरहबा वो वलवले
जिन से वाबस्ता हैं तेरी मेरी सोहबत के मज़े

कोसने वालों ने कोसा है मिज़ाज-ए-हुस्न को
लूटने वालों ने लूटे हैं मुहब्बत के मज़े

अहल-ए-दानिश सो रहे थे वादी-ए-इदराक में
बस 'बशर' ही ले रहा था दश्त-ए-वहशत के मज़े

— Dharmesh bashar

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