अब के जो लौट कर मैं तिरे पास आऊँगा
तुझको बिठा के सामने ग़ज़लें सुनाऊँगा
है ज़िन्दगी की नब्ज़ तिरे इख़्तियार में
रूठेगी ज़िन्दगी तो मैं तुझको मनाऊँगा
कब तक यूँँ ही अँधेरे में खाऊँगा ठोकरें
सोचा है अबके घर में कोई चाँद लाऊँगा
शायद मिरे मिज़ाज से वाक़िफ़ नहीं है तू
तू ज़ुल्म भी करेगा तो मैं भूल जाऊँगा
जीने की आरज़ू भी बड़ी चीज़ है मगर
किस तरह आईने को मैं सूरत दिखाऊँगा
छाए तो उनके फूल से चेहरे पे मुर्दनी
हँस-हँसके अपने ज़ख़्मों को ख़ुद गुदगुदाऊँगा
उनके बग़ैर कैसे कटी है 'बशर' हयात
पूछेंगे जब वो मुझ सेे तो मैं क्या बताऊँगा
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