main raah-e-shauq men thak kar jahaan jahaan thehra | मैं राह-ए-शौक़ में थक कर जहाँ जहाँ ठहरा

  - Dharmesh bashar

मैं राह-ए-शौक़ में थक कर जहाँ जहाँ ठहरा
वहीं पे ही तिरी ज़ुल्फ़ों का कारवाँ ठहरा

कोई बताए कि ये क़ाफ़िला-ए-जौर-ओ-सितम
चला कहाँ से किधर को कहाँ कहाँ ठहरा

ये दिल था रोज़-ए-अज़ल से अलामत-ए-हस्ती
जो मर गया तो मिरी ज़ात का निशाँ ठहरा

न आज जिस्म है बस में न रूह क़ब्ज़े में
ज़हे-नसीब इसी रोज़ इम्तिहाँ ठहरा

वो बर्क़-ओ-राद वो आँधी वो क़हर की बारिश
जो ग़र्क़ हो के रहा मेरा आशियाँ ठहरा

घनेरा साया हो बादल हो या के हो गेसू
जो दे सुकून वही मेरा साएबाँ ठहरा

उसी ने नज़रें चुराई रहा जो नूर-ए-नज़र
उसी ने राज़ बिखेरे जो राज़-दाँ ठहरा

तिरे जमाल को माना मगर ये क्या कम है
तिरा 'बशर' भी तो सरताज-ए-आशिक़ाँ ठहरा

  - Dharmesh bashar

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