"खिलौना"

तुम को इस दिल से शिकायत थी कि बेकार है ये
हर हसीना की मुहब्बत का गिरफ़्तार है ये
हुस्न के फ़ैज़ का हर वक़्त तलब-गार है ये
दौड़ते फिरता है पर अस्ल में बीमार है ये
हम को अच्छी नज़र आती नहीं हालत इस की
जाओ और जल्द करा लाओ मरम्मत इस की

सुन के ये हुक्म सर-ए-शौक़ झुकाया मैं ने
दिल-ए-बीमार तबीबों को दिखाया मैं ने
हाल-ए-ना-साज़ ब-तफ़सील सुनाया मैं ने
उस के फ़रमानों को सीने से लगाया मैं ने
बोले इस दिल से तुम्हें हाथ न धोने देंगे
इक जवाँ-साल को मरहूम न होने देंगे

देखते देखते तख़्ते पे लिटाया मुझ को
फिर हदफ़ अपनी जराहत का बनाया मुझ को
आलम-ए-ख़्वाब में क्या क्या न सताया मुझ को
होश आ जाने पे मुज्दा ये सुनाया मुझ को
आप के पहलू में अब एक दिल-ए-कामिल है
जिस के औसाफ़-ए-हमीदा का बयाँ मुश्किल है

साज़ कहिए तो हर इक तार है उम्दा इस का
आईना कहिए तो हर अक्स है उजला इस का
है खिलौना तो हर इक खेल अनोखा इस का
गोया हर रंग ज़माने से निराला इस का
ख़ंदा-पेशानी से तुम साथ इसे ले जाओ
जिन को शिकवा था उन्हें खोल के दिल दिखलाओ

जान-ए-मन ये रहा वो दिल ज़रा देखो इस को
कोई शक हो तो बड़े शौक़ से परखो इस को
है नई चीज़ नए ढंग से जाँचो इस को
जी को भा जाए तो फिर प्यार से थामो इस को

आप के हाथ से नागाह अगर छूट गया
इक खिलौना ही तो है टूट गया टूट गया

— Dharmesh bashar

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