'गदागर'
कल सड़क पर इक गदागर दफ़'अतन जो दिख गया
चंद सिक्के भीक देकर मैं ने उस से ये कहा
भाई तुम मर्ज़ी के अपनी मालिक-ओ-मुख़्तार हो
इक गुज़ारिश है मगर जो सुनने को तैयार हो
दौर-ए-पीरी है मगर आ'ज़ा तो चलते हैं अभी
भीक में ज़िल्लत है ढूँढो काम धंधा तुम कोई
हाथ फैलाना किसी के सामने अच्छा नहीं
तुम से सालिम शख़्स पर पेशा ये कुछ जँचता नहीं
एक ठंडी आह भर कर मुस्कुराया वो ज़रा
चंद लम्हे सोच कर कुछ उस ने बोला साहिबा
किस को है मर्ज़ी पे अपनी इस जहाँ में इख़्तियार
मैं ने कब चाहा था हो पामाल यूँ मेरा वक़ार
मैं हुनर रखता था साहिब मैं भी इक फ़नकार था
और फ़न मेरा फ़ुनूस-ए-ख़ास का सरदार था
शे'र कहता था ग़ज़ब के नाम था हर सू मिरा
सुनने वालों पे चला करता था क्या जादू मिरा
शोहरत-ओ-इज़्ज़त भी थी और ज़र भी था हासिल मुझे
ज़िन्दगी लगती थी मिस्ल-ए-नेमत-ए-कामिल मुझे
फिर हुआ कुछ यूँ कि ये दुनिया मशीनी हो गई
और शे'र-ओ-नग़मा की रफ़्तार धीमी हो गई
अब नहीं सजतीं कहीं शे'र-ओ-सुख़न की महफ़िलें
अब कहाँ वो लोग जो ग़ज़लें सुने नज़्में सुने
शा'इरी में अब किसी इंसाँ को दिलचस्पी कहाँ
अब तो ये फ़न हो चुका है एक भूली दास्ताँ
मेरी मुश्किल है कि मैं ने और कुछ सीखा नहीं
उम्र के इस दौर में वैसे भी कुछ होता नहीं
या'नी मुझ जैसे तो अब के वक़्त में बेकार हैं
माँगते हैं भीक हाँ बेहद ज़लील-ओ-ख़्वार हैं















