"तस्वीर-कशी"
जाँ अब तिरी तस्वीर में जो आने लगी है
गुल-पोश हसीं शाम को बहकाने लगी है
तस्वीर तिरी दिल मिरा बहलाने लगी है
उजड़े हुए गुलज़ार को महकाने लगी है
मैं बात जो करता था तो हो जाती थी नाराज़
अब आँख झुका लेती है शर्माने लगी है
जो मुझ से लगातार बचाती रही नज़रें
अब मुझ पे नज़र डाल के मुस्काने लगी है
जो हाथ लगाने पे रहा करती थी ख़ामोश
अब शे'र सुनाती है ग़ज़ल गाने लगी है
मैं इस की अदाओं पे रहा मस्त हमेशा
अब ये मिरे अश'आर पे लहराने लगी है
जो प्यार के लम्हात तिरे साथ गुज़ारे
तस्वीर तिरी बारहा दोहराने लगी है
कल तक जो बनी रहती थी दीवार की ज़ीनत
अब दिल के हर इक गोशे को गरमाने लगी है
आँखों में मिरी देख के तस्वीर ख़ुद अपनी
क्या जानिए किस बात पे इतराने लगी है
सीने को ढके रखता था जो रेशमी आँचल
दो चार दिनों से उसे सरकाने लगी है
इक रोज़ इसे यूँ ही कहीं छेड़ दिया था
ये मुझ को उसी रोज़ से उकसाने लगी है
अब इस पे भी कुछ रंग तिरा चढ़ने लगा तो
बल खा के मिरे सामने इठलाने लगी है
ग़लती से जो है देख ली तस्वीर कोई और
मुरझा के अब इस तरह वो ग़म खाने लगी है
कल रात 'बशर' हम ने जो शाने को हिलाया
कहने लगी सो जाओ कि नींद आने लगी है















