"आसमानी ख़्वाब"

ये भी इक नेमतों में नेमत है
आदमी ख़्वाब देख सकता है
या'नी दुनिया के रंज से थक कर
नींद के मख़मली से बिस्तर पर
अपनी दुनिया से मीलों दूर कहीं
नई दुनिया फरोल सकता है
हाँ मगर ख़्वाब हैं कई सारे
ख़्वाब झूटे भी ख़्वाब सच्चे भी
ख़्वाब बदतर हैं ख़्वाब अच्छे भी
कुछ तो हैं ख़्वाब कच्ची नींदों के
कुछ हैं गहराइयों में डूबे हुए
उन
में कुछ हैं फ़ुज़ूल बे-बुनियाद
और कुछ क़ीमती हैं हीरों से
कुछ में उम्मीद साफ़ दिखती है
यार की दीद साफ़ दिखती है
कुछ धुँदलकों में डूबे हैं जैसे
किसी देरीना इश्क़ के बिल-अक्स
लूट जाने का दर्स देते हैं
फिर न आने का दर्स देते हैं

मैं सुनाता हूँ इक निशानी ख़्वाब
ख़्वाब था एक आसमानी ख़्वाब
मैं ने देखा कि मर गया हूँ मैं
और फिर से उठाया जा चुका हूँ
एक मैदान है अदालत का
मैं कटहरे में लाया जा चुका हूँ
मुज़्तरिब हूँ मगर डरा हुआ सा
ख़ौफ़ से जिस्म है मरा हुआ सा
सामने ज़िंदगी का ख़ाका है
इसी अस्ना में आसमाँ से कहीं
एक आवाज़ गूँजती है वहाँ
ये फ़ुलाँ है न और इब्न-ए-फ़ुलाँ
इस से पूछो कहाँ से आया है
कौन सी चीज़ साथ लाया है
मैं ने रोते में गिड़गिड़ाते में
इतना सा कह दिया कि मेरे रब
तू नहीं था तो मैं ने दुनिया में
तेरे बंदों से बस मुहब्बत की
फिर से आवाज़ गूँजती है वहाँ
मेरा बंदा है ये जो इब्न-ए-फ़ुलाँ
इस से कह दो कि उस को बख़्श दिया

— Dharmesh bashar

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