vo zakham dene men kamaal rakhta hai | वो ज़ख़्म देने में कमाल रखता है

  - Dharmesh bashar

वो ज़ख़्म देने में कमाल रखता है
मैं तो समझता था ख़याल रखता है

न पूछ दिल का हाल हिज्रे-यार में
ये आदमी को बस निढाल रखता है

ये और बात पंछी क़ैद में नहीं
मगर बिछा वो सारे जाल रखता है

जवाब कौन दे यहाँ के हर कोई
सवाल के एवज़ सवाल रखता है

सियाह रात के नसीब में क़मर
ख़ुदा करिश्मा भी कमाल रखता है

चमन तो बाग़बान के सुपुर्द था
ये कौन अब इसे सँभाल रखता है

सफ़र में रेल से उतरते वक़्त वो
कहाँ बिछड़ने का मलाल रखता है

फ़क़त ख़ुदा ही साथ रहता है 'बशर'
वगरना कौन किस की ढाल रखता है

  - Dharmesh bashar

Tasawwur Shayari

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