बे-वफ़ा हैं तो दामन बचा लें

वरना जूड़े में हम को सजा लें

गर बनाना है दूल्हा बना लें
वरना हम से वो दामन छुड़ा लें

जो हुआ सो हुआ उन से बोलो
मेरे कूचे से दूरी बना लें

बारिश-ए-संग का है ये मौसम
हुस्न कह दो ज़मीं में छुपा लें

छोड़ दे जब सर-ए-राह दुनिया
उन से कहना कि हम को बुला लें

ज़िंदगी की ये शाम आख़िरी है
हुस्न वाले गले से लगा लें

क़ब्र में लाश रखने से पहले
कोई अच्छा सा आँचल उड़ा लें

कल क़यामत सर-ए-शाम होगी
कहना पहले से दीपक जला लें

मैं तो ख़ार-ए-मुग़ीलाँ हूँ कोई
गर बचाना हो दामन बचा लें

ज़िंदगी चार दिन की बची है
जो कमाना है जल्दी कमा लें

— Prashant Kumar

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