कुछ लोग ज़माने में हम नाम निकल आए

जो ख़ास सभी से थे वो 'आम निकल आए

है सब से जुदा तेरा अंदाज़ तबस्सुम का
जो एक हँसी में दो गुलफ़ाम निकल आए

जो सब को सिखाते थे इकराम मुहब्बत का
उन पर ही मुहब्बत के इल्ज़ाम निकल आए

जो सब को बताते थे मैं अजनबी हूँ कोई
वो नाम से मेरे ही बदनाम निकल आए

तू अहल-ए-ज़मीं से सुन हर बात बना के रख
कुछ भी न पता किस से क्या काम निकल आए

— Prashant Kumar

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