hain aur bhi duniya mein suhan-var bahut achhe | हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे

  - Mirza Ghalib

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और

  - Mirza Ghalib

Duniya Shayari

Our suggestion based on your choice

    तुम आसमान पे जाना तो चाँद से कहना
    जहाँ पे हम हैं वहाँ चांदनी बहुत कम है
    Shakeel Azmi
    49 Likes
    ये दुनिया ग़म तो देती है शरीक-ए-ग़म नहीं होती
    किसी के दूर जाने से मोहब्बत कम नहीं होती
    Unknown
    43 Likes
    एक तरफ़ है पूरी दुनिया एक तरफ़ है मेरा घर
    लेकिन तुमको बतला दूँ मैं दुनिया से है अच्छा घर

    सब कमरों की दीवारों पर तस्वीरें हैं बस तेरी
    मुझसे ज़ियादा तो लगता है जानेमन ये तेरा घर
    Read Full
    Tanoj Dadhich
    36 Likes
    सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चराग़
    जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले
    Majrooh Sultanpuri
    19 Likes
    तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझसे
    तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी

    डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे
    और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी
    Read Full
    Tehzeeb Hafi
    329 Likes
    मिरे होंटों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो
    कि इसके बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
    Waseem Barelvi
    125 Likes
    हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे
    इक बाग़ नहीं, इक खेत नहीं, हम सारी दुनिया मांगेगे
    Faiz Ahmad Faiz
    51 Likes
    फ़न्न-ए-ग़ज़ल-आराई दे
    लहजे को सच्चाई दे

    दुनिया है जंगल का सफ़र
    लछमन जैसा भाई दे
    Read Full
    Tariq Shaheen
    32 Likes
    रात की भीगी-भीगी मिट्टी से कुछ उजाले उगा रही होगी
    मेरी दुनिया में करके अँधियारा वो दिवाली मना रही होगी
    Tanveer Ghazi
    45 Likes
    ये जितने मसाइल हैं दुनिया में, सब
    तुझे देखने से सुलझ जायेंगे
    Siddharth Saaz
    28 Likes

More by Mirza Ghalib

As you were reading Shayari by Mirza Ghalib

    इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'
    कि लगाए न लगे और बुझाए न बने
    Mirza Ghalib
    92 Likes
    मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किए हुए
    जोश-ए-क़दह से बज़्म चराग़ाँ किए हुए

    करता हूँ जम्अ' फिर जिगर-ए-लख़्त-लख़्त को
    अर्सा हुआ है दावत-ए-मिज़्गाँ किए हुए

    फिर वज़-ए-एहतियात से रुकने लगा है दम
    बरसों हुए हैं चाक गरेबाँ किए हुए

    फिर गर्म-नाला-हा-ए-शरर-बार है नफ़स
    मुद्दत हुई है सैर-ए-चराग़ाँ किए हुए

    फिर पुर्सिश-ए-जराहत-ए-दिल को चला है इश्क़
    सामान-ए-सद-हज़ार नमक-दाँ किए हुए

    फिर भर रहा हूँ ख़ामा-ए-मिज़्गाँ ब-ख़ून-ए-दिल
    साज़-ए-चमन तराज़ी-ए-दामाँ किए हुए

    बाहम-दिगर हुए हैं दिल ओ दीदा फिर रक़ीब
    नज़्ज़ारा ओ ख़याल का सामाँ किए हुए

    दिल फिर तवाफ़-ए-कू-ए-मलामत को जाए है
    पिंदार का सनम-कदा वीराँ किए हुए

    फिर शौक़ कर रहा है ख़रीदार की तलब
    अर्ज़-ए-मता-ए-अक़्ल-ओ-दिल-ओ-जाँ किए हुए

    दौड़े है फिर हर एक गुल-ओ-लाला पर ख़याल
    सद-गुलिस्ताँ निगाह का सामाँ किए हुए

    फिर चाहता हूँ नामा-ए-दिलदार खोलना
    जाँ नज़्र-ए-दिल-फ़रेबी-ए-उनवाँ किए हुए

    माँगे है फिर किसी को लब-ए-बाम पर हवस
    ज़ुल्फ़-ए-सियाह रुख़ पे परेशाँ किए हुए

    चाहे है फिर किसी को मुक़ाबिल में आरज़ू
    सुरमे से तेज़ दश्ना-ए-मिज़्गाँ किए हुए

    इक नौ-बहार-ए-नाज़ को ताके है फिर निगाह
    चेहरा फ़रोग़-ए-मय से गुलिस्ताँ किए हुए

    फिर जी में है कि दर पे किसी के पड़े रहें
    सर ज़ेर-बार-ए-मिन्नत-ए-दरबाँ किए हुए

    जी ढूँडता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन
    बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए

    'ग़ालिब' हमें न छेड़ कि फिर जोश-ए-अश्क से
    बैठे हैं हम तहय्या-ए-तूफ़ाँ किए हुए
    Read Full
    Mirza Ghalib
    लरज़ता है मिरा दिल ज़हमत-ए-मेहर-ए-दरख़्शाँ पर
    मैं हूँ वो क़तरा-ए-शबनम कि हो ख़ार-ए-बयाबाँ पर

    न छोड़ी हज़रत-ए-यूसुफ़ ने याँ भी ख़ाना-आराई
    सफ़ेदी दीदा-ए-याक़ूब की फिरती है ज़िंदाँ पर

    फ़ना तालीम-ए-दर्स-ए-बे-ख़ुदी हूँ उस ज़माने से
    कि मजनूँ लाम अलिफ़ लिखता था दीवार-ए-दबिस्ताँ पर

    फ़राग़त किस क़दर रहती मुझे तश्वीश-ए-मरहम से
    बहम गर सुल्ह करते पारा-हा-ए-दिल नमक-दाँ पर

    नहीं इक़लीम-ए-उल्फ़त में कोई तूमार-ए-नाज़ ऐसा
    कि पुश्त-ए-चश्म से जिस की न होवे मोहर उनवाँ पर

    मुझे अब देख कर अबर-ए-शफ़क़-आलूदा याद आया
    कि फ़ुर्क़त में तिरी आतिश बरसती थी गुलिस्ताँ पर

    ब-जुज़ परवाज़-ए-शौक़-ए-नाज़ क्या बाक़ी रहा होगा
    क़यामत इक हवा-ए-तुंद है ख़ाक-ए-शहीदाँ पर

    न लड़ नासेह से 'ग़ालिब' क्या हुआ गर उस ने शिद्दत की
    हमारा भी तो आख़िर ज़ोर चलता है गरेबाँ पर

    दिल-ए-ख़ूनीं-जिगर बे-सब्र-ओ-फ़ैज़-ए-इश्क़-ए-मुस्तग़नी
    इलाही यक क़यामत ख़ावर आ टूटे बदख़्शाँ पर

    'असद' ऐ बे-तहम्मुल अरबदा बे-जा है नासेह से
    कि आख़िर बे-कसों का ज़ोर चलता है गरेबाँ पर
    Read Full
    Mirza Ghalib
    तुम जानो तुम को ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो
    मुझ को भी पूछते रहो तो क्या गुनाह हो

    बचते नहीं मुवाख़ज़ा-ए-रोज़-ए-हश्र से
    क़ातिल अगर रक़ीब है तो तुम गवाह हो

    क्या वो भी बे-गुनह-कुश ओ हक़-ना-शनास हैं
    माना कि तुम बशर नहीं ख़ुर्शीद ओ माह हो

    उभरा हुआ नक़ाब में है उन के एक तार
    मरता हूँ मैं कि ये न किसी की निगाह हो

    जब मय-कदा छुटा तो फिर अब क्या जगह की क़ैद
    मस्जिद हो मदरसा हो कोई ख़ानक़ाह हो

    सुनते हैं जो बहिश्त की तारीफ़ सब दुरुस्त
    लेकिन ख़ुदा करे वो तिरा जल्वा-गाह हो

    'ग़ालिब' भी गर न हो तो कुछ ऐसा ज़रर नहीं
    दुनिया हो या रब और मिरा बादशाह हो
    Read Full
    Mirza Ghalib
    लाग़र इतना हूँ कि गर तू बज़्म में जा दे मुझे
    मेरा ज़िम्मा देख कर गर कोई बतला दे मुझे

    क्या तअ'ज्जुब है जो उस को देख कर आ जाए रहम
    वाँ तलक कोई किसी हीले से पहुँचा दे मुझे

    मुँह न दिखलावे न दिखला पर ब-अंदाज़-ए-इताब
    खोल कर पर्दा ज़रा आँखें ही दिखला दे मुझे

    याँ तलक मेरी गिरफ़्तारी से वो ख़ुश है कि मैं
    ज़ुल्फ़ गर बन जाऊँ तो शाने में उलझा दे मुझे
    Read Full
    Mirza Ghalib

Similar Writers

our suggestion based on Mirza Ghalib

Similar Moods

As you were reading Duniya Shayari Shayari