ख़्वाबों में सही रोज़ सताने के लिए आ

आ फिर से मिरे दिल को चुराने के लिए आ

हर कोई समझता है मुझे काँच का मरहम
कुछ और हूँ मैं इनको बताने के लिए आ

हर बार तिरे बस में कहाँ मुझ को उठाना
इस बार निगाहों से गिराने के लिए आ

वो रात वही दिन वही तन्हाई का आलम
आँखों में वही प्यास जगाने के लिए आ

साँसों के चराग़ाँ तिरी ज़ुल्फ़ों ने बुझाए
अब तू ही जनाज़े को उठाने के लिए आ

इक तेरे सिवा था ही मिरा कौन जहाँ में
सो क़ब्र की भी रस्म निभाने के लिए आ

जिन दस्त-ए-मुबारक में मिरी जान बसी थी
मस्जिद में वही हाथ उठाने के लिए आ

— Prashant Kumar

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