
ज़माने के ज़ुल्म-ओ-सितम देख लो
मिरी ज़िंदगी के भी ग़म देख लो
क़यामत से बढ़कर रहे हैं सभी
कमर के न मानो तो ख़म देख लो
मोहब्बत तो करने चले हो मगर
मोहब्बत में क्या-क्या हैं ग़म देख लो
ये ख़ंजर चलाने से पहले सुनो
मिरा हाल तो कम से कम देख लो
अरे अब के ज़ाहिद भी पीने लगे
न मानो तो दैर-ओ-हरम देख लो
— Prashant Kumar















