तराश कर मेरे बाज़ू उड़ान छोड़ गया
हवा के पास बरहना कमान छोड़ गया
रफ़ाक़तों का मेरी उस को ध्यान कितना था
ज़मीन ले ली मगर आसमान छोड़ गया
अजीब शख़्स था बारिश का रंग देख के भी
खुले दरीचे पे इक फूल-दान छोड़ गया
जो बादलों से भी मुझ को छुपाए रखता था
बढ़ी है धूप तो बे-साएबान छोड़ गया
निकल गया कहीं अन-देखे पानियों की तरफ़
ज़मीं के नाम खुला बादबान छोड़ गया
उक़ाब को थी ग़रज़ फ़ाख़्ता पकड़ने से
जो गिर गई तो यूँँही नीम-जान छोड़ गया
न जाने कौन सा आसेब दिल में बस्ता है
कि जो भी ठहरा वो आख़िर मकान छोड़ गया
अक़ब में गहरा समुंदर है सामने जंगल
किस इंतिहा पे मेरा मेहरबान छोड़ गया
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Parveen Shakir
our suggestion based on Parveen Shakir
As you were reading Ujaala Shayari Shayari