मैं दुनिया की ख़ातिर हूँ दिल होने वाला

मिरा अहद है मुस्तक़िल होने वाला

ख़ुदा ऐसा तन्हा किसी को न रक्खे
कोई भी न हो जब मुख़िल होने वाला

पस-ए-आब-ओ-गिल मैं दिखा भी चुका हूँ
तमाशा सर-ए-आब-ओ-गिल होने वाला

सफ़ीने भरे आ रहे हैं बराबर
है दरिया कहीं मुंतक़िल होने वाला

वही एक हम हैं वही एक तुम हो
ये आलम नहीं मो'तदिल होने वाला

लहू के किनारे भी ज़द पर हैं दोनों
ये क्या ज़ख़्म है मुंदमिल होने वाला

मिरी राख देखो तो क्या मुतमइन है
मैं इक शख़्स था मुश्तइ'ल होने वाला

— Shaheen Abbas

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Dariya Shayari

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