रौशनी जैसे किसी शाम के आने से हुई
ख़ाक दरयाफ़्त मेरी ख़ाक उड़ाने से हुई
रंग फिर आए नहीं मौज में पहले की तरह
ऐसी तस्वीर मुअख़्ख़र तेरे जाने से हुई
तू ने चुप साध ली मौज़ू'-ए-मोहब्बत दे कर
गुफ़्तुगू तुझ से जो होनी थी ज़माने से हुई
था मगर ऐसा अकेला मैं कहाँ था पहले
मेरी तन्हाई मुकम्मल तेरे आने से हुई
अपने बारे में वो इक बात जो होती नहीं थी
तेरी आवाज़ में आवाज़ मिलाने से हुई
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