फ़िक्र के आईने में जब भी मुझे देखता हूँ

ख़ुद को दरिया से फ़क़त बूंद लिए देखता हूँ

बे ख़बर, रोड़ पे इन भागते बच्चों को मैं
कितनी हसरत से थकन ओढ़े हुए देखता हूँ

कितनी उम्मीद से आया था तुम्हारे दर पर
तुम ने बस यूँ ही मुझे कह दिया है देखता हूँ

एक मंज़र को तका करता हूँ पहरों तक मैं
पूछने लगते हैं अहबाब किसे देखता हूँ

कई क़िस्से तेरे चेहरे पे उभर आते हैं
जब भी इक अर्सा गुज़रने पे तुझे देखता हूँ

मुझ को हर बार मेरी प्यास डरा देती है
गर ज़रा सा कभी दरिया के परे देखता हूँ

— Afzal Ali Afzal

More by Afzal Ali Afzal

Other ghazal from the same pen

See all from Afzal Ali Afzal →

Motivational Shayari

Shers of motivational.

All Motivational Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling