रात जैसे 'अज़ाबों सी नाज़िल हुई
नींद हमको सराबों सी हासिल हुई
हाए ग़ुरबत में क्या दौर आया ख़ुदा
ज़िन्दगी किस क़दर पुर मसाइल हुई
शब गुज़ारी तेरे ही खयालों में कल
फिर सहर भी तिरी और माइल हुई
मुझ को इक पल न आया बिछड़ के क़रार
तुझ को भी तो जमीअत न हासिल हुई
हिचकियों ने बहुत ही परेशां किया?
जी! बहुत मअ'ज़रत, तुम को मुश्किल हुई
इत्र की शीशियां ढुल गई हो कहीं
तेरी खुशबू यूँँ सांसों में शामिल हुई
अब मोहब्बत का मज़हब भी ढूँढे हैं लोग
या ख़ुदा तेरी ये दुनिया ज़ाहिल हुई
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