दिल में लिए ग़ुबार तुझे सोचते रहे
हम मेह्व-ए-इंतज़ार तुझे सोचते रहे
आँखों से मेरी जब शब-ए-फ़ुरक़त न कट सकी
दिन ले के मुस्तआर तुझे सोचते रहे
तेरे हुए न हम तुझे अपना बना सके
बस हो के शर्मसार तुझे सोचते रहे
हालाँकि भर दिए थे सभी ज़ख़्म वक़्त ने
फिर भी कभी-कभार तुझे सोचते रहे
हम को सज़ा सुना के क़लम तोड़ भी दिया
हम फिर भी ज़ेर-ए-दार तुझे सोचते रहे
फिर पगड़ियों की डोर से बांधे गए क़दम
तुझ से मगर था प्यार तुझे सोचते रहे
जब भी उठा है दर्द दिल-ए-बेकरार में
दिल थाम बेक़रार तुझे सोचते रहे
— Afzal Ali Afzal















