puraani chaahat ke zakhm ab tak bhare nahin hain | पुरानी चाहत के ज़ख़्म अब तक भरे नहीं हैं

  - Ashu Mishra

पुरानी चाहत के ज़ख़्म अब तक भरे नहीं हैं
और एक लड़की पड़ी है पीछे बड़े जतन से

  - Ashu Mishra

Aarzoo Shayari

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    ये क़त्ल-ए-आम और बे-इज़्न क़त्ल-ए-आम क्या कहिए
    ये बिस्मिल कैसे बिस्मिल हैं जिन्हें क़ातिल नहीं मिलता

    वहाँ कितनों को तख़्त ओ ताज का अरमाँ है क्या कहिए
    जहाँ साइल को अक्सर कासा-ए-साइल नहीं मिलता
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    Asrar Ul Haq Majaz
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    हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
    बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
    Mirza Ghalib
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    'असद' ये शर्त नहीं है कोई मुहब्बत में
    कि जिससे प्यार करो उसकी आरज़ू भी करो
    Subhan Asad
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    ज़रा पाने की चाहत में बहुत कुछ छूट जाता है
    नदी का साथ देता हूँ समंदर रूठ जाता है
    Aalok Shrivastav
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    हमें इस मिट्टी से कुछ यूँ मुहब्बत है
    यहीं पे निकले दम दिल की ये हसरत है

    हमें क्यों चाह उस दुनिया की हो मौला
    हमारी तो इसी मिट्टी में जन्नत है
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    Harsh saxena
    मिरी आरज़ू का हासिल तिरे लब की मुस्कुराहट
    हैं क़ुबूल मुझ को सब ग़म तिरी इक ख़ुशी के बदले
    Kashif Adeeb Makanpuri
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    इस क़दर था खटमलों का चारपाई में हुजूम
    वस्ल का दिल से मिरे अरमान रुख़्सत हो गया
    Akbar Allahabadi
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    उसको चाहा और चाहत पर क़ायम हैं
    पर अफ़सोस के हम इज़हार नहीं कर सकते
    Shadab Asghar
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    काम के बोझ तले दब गए तो समझे हम
    लोग क्यूँ चाह के भी दिल का नहीं कर पाते
    Jangveer Singh Rakesh
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    मैं सो रहा हूँ तेरे ख़्वाब देखने के लिए
    ये आरज़ू है कि आँखों में रात रह जाए
    Shakeel Azmi
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As you were reading Shayari by Ashu Mishra

    उस की क़ुर्बत में हुआ है ये ख़सारा मेरा
    आप पढ़ लीजिए हर आँख में क़िस्सा मेरा

    हर नई साँस पे बनता हूँ बिगड़ जाता हूँ
    ये हवा ख़त्म ही कर दे न तमाशा मेरा

    अब तो होंटों पे कभी फूल भी खिल जाते हैं
    आप ने इन दिनों देखा नहीं चेहरा मेरा

    मैं ने रो रो के उसे ग़ैर का होने न दिया
    उस बला-ख़ेज़ को ज़ंजीर था गिर्या मेरा

    अब नए दश्त मुझे देख के डर जाते हैं
    मेरी वहशत ने बढ़ा रक्खा है रुत्बा मेरा
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    Ashu Mishra
    ख़ुदा गर मेरे हाथों में दिलासे की चिलम भरता
    मैं अहल-ए-हिज्र के ठंडे पड़े सीनों में दम भरता

    अगर मुझ को किसी के हुस्न का मौसम न रास आता
    मैं दिल के सारे ख़ानों में तिरी फ़ुर्क़त के ग़म भरता

    मुसव्विर मैं हसीं लगता तिरे सब शाहकारों से
    तू मुझ में रंग तो भरता भले औरों से कम भरता

    बहुत थक कर सवाल-ए-वस्ल उस से कर दिया मैं ने
    मैं कब तक देखा-देखी से मोहब्बत का शिकम भरता
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    Ashu Mishra
    तुम्हारे साथ ये क़िस्सा कभी कभार का है
    मगर ये हिज्र मिरे साथ बार-बार का है

    हमारे दरमियाँ इक शक की फ़िल्म है जिस में
    कहीं कहीं पे कोई सीन ए'तिबार का है

    ये तेरी हम पे इनायत है या चमन में किसी
    ख़िज़ाँ-नसीब के हिस्से में सुख बहार का है

    अगर तू ख़ुद को खुला छोड़ता है जान-ए-बहार
    तो तुझ पे हक़ तिरे पहले उमीद-वार का है

    ये तेरा जिस्म है या रहगुज़ार-ए-गुल है कोई
    क़बा का बंद है या पेड़ रेगज़ार का है

    मैं दिल के बारे में इतना ही जान पाया हूँ
    कभी ये एक का होता था अब हज़ार का है
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    Ashu Mishra
    लाखों की भीड़ में भी कोई हम-नफ़स न हो
    अल्लाह तेरी ख़ल्क़ का मतलब क़फ़स न हो

    रंग-ए-जमाल-ए-इश्क़ से कूँची भरी हो पर
    तस्वीर खींचने के लिए कैनवस न हो

    कहिए कि कैसे दिल लगे ऐसी जगह जहाँ
    बातें तो बे-हिसाब हों बातों में रस न हो

    मैं इश्क़ कर रहा हूँ मगर सोचता भी हूँ
    पिछले बरस जो हो चुका अब के बरस न हो

    हैरत है एक उम्र की बारिश के बावजूद
    आँखों में कोई शक्ल है जो टस से मस न हो

    'मिश्रा' जी ऐसे शख़्स से रहते हैं दूर-दूर
    जिस में कि रंग-ए-इश्क़ हो रंग-ए-हवस न हो
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    Ashu Mishra
    ऐसे खुलते हैं फ़लक पर ये सितारे शब के
    जिस तरह फूल हों सारे ये बहार-ए-शब के

    तेरी तस्वीर बना कर तिरी ज़ुल्फ़ों के लिए
    हम ने काग़ज़ पे कई रंग उतारे शब के

    वो मुसव्विर जो बनाता है सहर का चेहरा
    उस से कहना कि अभी दर्द उभारे शब के

    क्या किसी शख़्स की हिजरत में जली हैं रातें
    क्यूँ शरारों से चमकते हैं सितारे शब के

    ये तिरे हिज्र ने तोहफ़े में दिए हैं हम को
    ये जो मा'सूम से रिश्ते हैं हमारे शब के

    एक मुद्दत से हमें नींद न आई 'आशू'
    उम्र इक काट दी हम ने भी सहारे शब के
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    Ashu Mishra

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