jun hi dekha teri raushan jabeen ka noor khilwat men | जूँ ही देखा तेरी रौशन जबीं का नूर ख़लवत में

  - Afzal Ali Afzal

जूँ ही देखा तेरी रौशन जबीं का नूर ख़लवत में
है मेहव-ए-रश्क़ कोह-ए-क़ाफ़ की वो हूर ख़लवत में

तेरी यादों ने कर डाला हमें मजबूर ख़लवत में
छलक उठ्ठा है पलकों से ग़म-ए-मस्तूर ख़लवत में

मेरी साँसें महकती हैं तेरी ख़ुश्बू से अक्सर यूँँ
जूँ कोई गुंचा-ए-दिल हो तेरा मज़कूर ख़लवत में

अज़ीयतनाक रातों में सिसकती हैं तुम्हारे बिन
मेंरे कमरे की दीवारें ग़मों से चूर ख़लवत में

शिकम ख़ाली बदन नंगा, है पैरों में थकन पहने
लिए बच्चों को रोता है कोई मज़दूर ख़लवत में

शब-ए-हिज्राँ की तन्हाई, तेरी फ़ुरक़त का ग़म उस पर
शिकस्ता दिल है यूँँ भी ज़ब्त से मामूर ख़लवत में

लिए पलकों पे मोती ग़म के दर आईना इक लड़की
तका करती है अपनी माँग का सिंदूर ख़लवत में

वबा फैली है आलम में, जिधर देखो उधर अफ़ज़ल
मुनासिब है कि रहिये अब सभी से दूर ख़लवत में

  - Afzal Ali Afzal

Taareef Shayari

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