चार क़तरे अश्कों के, हिस्से में हैं

और कुछ दुखड़े मेरे विरसे में हैं

जब से तुम ने मुझ को आने का कहा
मेरी नज़रें तब से ही ज़ीने में हैं

फिर बुज़ुर्गों की अना के वास्ते
ज़हर की दो शीशियाँ खुलने में हैं

लौट के घर आ गए हैं सब मगर
दिल तो बच्चों के अभी मेले में हैं

मर ही जाऊँ गर इन्हें तकमील दूँ
ख़्वाब इतने आँखों के पर्दे में हैं

सर से क़र्ज़ा बाप के उतरा नहीं
बेटियाँ अब दादियाँ बनने में हैं

मेरा लाशा रोक लीजे दो घड़ी
यार! मेरे यार अभी रस्ते में हैं

और तो कुछ भी नहीं अफ़ज़ल, फ़क़त!
सोग, उदासी, रंज-ओ-ग़म क़ासे में हैं

— Afzal Ali Afzal

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