यूँँ ही बढ़ती रहेंगी अगर तल्ख़ियाँ
तोड़ डालेंगी मेरा ये घर तल्ख़ियाँ
रख तो दूँ बाला-ए-ताक़ अपनी अना
रोक देती हैं मुझ को मगर तल्ख़ियाँ
ज़िन्दगी! क्या मोहब्बत यहीं ख़त्म है?
बढ़ रही है यहाँ किस क़दर तल्ख़ियाँ
अब किसी को कोई चाहता ही नहीं
कर गई हैं दिलों मैं यूँ घर तल्ख़ियाँ
इन पे चाहत की परतें चढ़ा दूँगा मैं
चढ़ गईं मेरे हत्थे अगर तल्ख़ियाँ
इस क़दर ख़ुद को अफ़ज़ल बनाएँगे हम
कर सकेंगी न हम पे असर तल्ख़ियाँ
— Afzal Ali Afzal















