साथ था इतना बस और बस
एक या दो बरस और बस
चाहतें हैं ये क्या आज-कल
काल्स कीं आठ दस और बस
तो मनाना है उस को तुझे
प्यार की थाम नस और बस
इस्मतें लुट रही हैं ये क्यूँ
इक ज़रा सी हवस और बस
था मिला वो मुझे इस तरह
चरसी को जूँ चरस और बस
डर किसी को नहीं होगा क्या
चंद रोज़ा क़फ़स और बस
— Afzal Ali Afzal















