नज़्म - होली

तुम हमारे थे बस इक हमारे कभी
याद आता है हम को ज़माना वही

दरमियाँ थी हमारे भी चाहत बहुत
साथ बीते कितने हसीं पल सनम
खिलखिलाने की हम को थी आदत मगर
हो गए कितने तन्हा तेरे बा'द हम

बिन तुम्हारे न दिल ये हमारा लगे
क्या ही रक्खा है दुनिया में हम से कहे

सारे जग से हम अब रूठे रूठे से हैं
हम को मतलब किसी से रहा ही नहीं
बस जिए जा रहे हैं तुम्हारे बिना
जैसे कुछ ज़िन्दगी में बचा ही नहीं,

हम को जानाँ तुम्हारी यूँ आदत हुई
देख लो बिन तुम्हारे जो हालत हुई

रंग बे-रंग हैं सब तुम्हारे बिना
रंग कोई भी अब हम पे फबता नहीं
इस लिए सब से हम, दूर बैठे रहे
रंग हम को किसी ने लगाया नहीं

घर मिठाई जो आई थी खाई नहीं
अब के होली भी हम ने मनाई नहीं....

— Afzal Ali Afzal

More by Afzal Ali Afzal

Other nazm from the same pen

See all from Afzal Ali Afzal →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling