kaise kate honge un ke raat din mere baghair | कैसे कटते होंगे उन के रात दिन मेरे बग़ैर

  - Afzal Ali Afzal

कैसे कटते होंगे उन के रात दिन मेरे बग़ैर
क्या सुहाती होंगी हाथों को शगुन की चूड़ियाँ

जिन को पहना दी गई हों पगड़ियों के नाम पर
जाके उनसे पूछिये हैं कितनी भारी चूड़ियाँ

देख हाथों में सखी के मुझ से यूँँ कहने लगी
मुझ को भी ला कर के दो ना बाबा ऐसी चूड़ियाँ

कितने कुनबे टूटे हैं सरहद बचाने के लिए
और टूटी हैं न जाने कितनी सारी चूड़ियाँ

नैन अचानक ही छलक उट्ठे जूँ ही उसने सुना
तुम पे ये अच्छी लगेंगी ले लो बीबी चूड़ियाँ

किरचियाँ आँखों में चुभती होंगी उनकी टूट कर
किस क़दर उनको रुलाती होंगी उनकी चूड़ियाँ

तर्जमानी  थी कभी अफ़ज़ल हमारे 'इश्क़ की
हो गईं हैं क्यूँँ भला अब बे मआनी चूड़ियाँ

  - Afzal Ali Afzal

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