वक़्त ने कर दिया धोके के हवाले मुझ को
चाबियाँ ग़ैरों को दीं और दिए ताले मुझ को
सब हैं मसरूफ़ यहाँ अपनी किसी जन्नत में
किस को पर्वा कि जहन्नम से निकाले मुझ को
दोस्त वो ग़म है जो इतनी से नहीं जाएगा
आधे ख़ाली नहीं भर के दे पियाले मुझ को
अब तो रातों के अँधेरों से है निस्बत ऐसी
कि बहुत चुभते हैं दिन के ये उजाले मुझ को
जो कि दरिया को निगल जाए मैं वो सहरा हूँ
फिर भला कैसे कोई अपना बना ले मुझ को
ये इरादा तो नहीं फिर भी कभी रस्सी पे
जो गला फिसले तो कोई न सँभाले मुझ को
राख का ढेर हूँ अब मुझ में नहीं चिंगारी
ऐ हवा अब तू जहाँ चाहे उड़ा ले मुझ को
ज़ीस्त है एक भँवर फँस गया हूँ मैं जिस में
मौत तू हाथ बढ़ा कर के बचा ले मुझ को
अब तो बस एक ही ख़्वाहिश रही है दिल को मिरे
एक दिन यूँ हो कोई हादसा खा ले मुझ को















