हुकूमत दाँव खेली जा रही हैबिचारी जनता फँसती जा रही हैन ही राइट न ही सेंटर न ही लेफ़्टअलग रस्ते पे दिल्ली जा रही हैसियासत जिस तरह की हो रही हैवतन तक़्सीम करती जा रही हैजो भी आवाज़ सच को उठ रही हैवो हर आवाज़ कुचली जा रही हैबचाओ मिल के सब जमहूरियत कोकि ये हाथों से छीनी जा रही है— Mohit Subran