कौन है वो शख़्स जिस ने तुम पे ये ख़ैरात की
कौन है वो शख़्स जिस को जिस्म की सौग़ात की
इक तरफ़ ख़ल्वत क़लक़ अश्कों में डूबी ज़िन्दगी
इक तरफ़ शॉपिंग सफ़र तय्यारियाँ बारात की
जानता था हश्र फिर क्यूँ चुन लिया ये रास्ता
जानकर क्यूँ ये शरारत मैं ने अपने साथ की
धूप पड़ने से ज़ियादा हो गई है ख़ुश्क ये
है ज़मीं इस वक़्त केवल मुंतज़िर बरसात की
तर्बियत में दरमियाँ अब फ़र्क़ कोई भी नहीं
एक जैसी हालतें हैं शहर और देहात की
— Mohit Subran















