"रोओ लड़को"

रोओ लड़को वर्ना ग़म ये तुम को पत्थर कर डालेगा
गुल के जैसे नाज़ुक मन को चुभता नश्तर कर डालेगा

मर्द नहीं रोते हैं आँसू रोना काम औरतों का है
इस
में तुम न फँसना लड़को कि ये काम लड़कियों का है
रोने पे क्या मर्द या औरत हूक किसी को उठ सकती है
तुम भी खुल के रो सकते हो रोना काम राहतों का है
पलकों को बोझल कर देगा आँखें बंजर कर डालेगा
रोओ लड़को वर्ना ग़म ये तुम को पत्थर कर डालेगा

बैठा है जो दिल की तह में उस ग़म को ऊपर लाओ तुम
पलकों के कोनों से उस का फिर क़तरा-क़तरा बहाओ तुम
सोचो न कोई क्या सोचेगा रोओ गर आता है रोना
ख़ाली कर दो आँखें अपनी अब और न अश्क दबाओ तुम
दिल ज़िंदा कर देगा मुर्दा हँसना दूभर कर डालेगा
रोओ लड़को वर्ना ग़म ये तुम को पत्थर कर डालेगा

कोई देता नहीं सहारा कोई गले लगाता नहीं गर
तो दीवार को काँधा समझो तो दीवार पे ही रख के सर
झर-झर अश्क बहाओ लड़को तुम को बेहद चैन मिलेगा
चेहरे पे इक हँसी खिलेगी मन भी थोड़ा होगा बेहतर
एक उदासी से भर देगा हालत बदतर कर डालेगा
रोओ लड़को वर्ना ग़म ये तुम को पत्थर कर डालेगा

— Mohit Subran

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Udasi Shayari

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