फिर बा'द चाहे इस के भुला दीजिए हमें
पर एक बार प्यार से तो देखिए हमें
ये उम्र आप को ही बिताई है सोच कर
इक रोज़ आप भी तो भला सोचिए हमें
ता-उम्र मन तड़पता रहा आप के लिए
अब मान जाइए यूँ न तड़पाइए हमें
ये आख़िरी है चाह इसे मान लीजिए
फिर चाहे क़त्ल शौक़ से कर डालिए हमें
इन बाज़ुओं में आप हमें भींच लीजिए
अपने बदन की ख़ुश्बू से महकाइए हमें
मर जाएँ हम कभी तो ज़ियादा न सोचना
अपने ही आस-पास में दफ़नाइए हमें
दिल ख़्वाहिशों में डूब चुका है ये आप की
इन ख़्वाहिशों की क़ैदस छुड़वाइए हमें
— Mohit Subran















