हौले-हौले गुज़र रहा हूँ मैं
वक़्त से पहले मर रहा हूँ मैं
ज़िन्दगी बस बसर की हो जिस ने
एक ऐसा बशर रहा हूँ मैं
फिर वो कोई भी शख़्स क्यूँ न सही
हर किसी को अखर रहा हूँ मैं
जाने क्या सूझी है जो शिद्दत से
ख़ुद को बर्बाद कर रहा हूँ
हाए ये सच वहाँ तबाही रही
आज तक भी जिधर रहा हूँ मैं
न गिनूँ इस जहान को फिर तो
हर जगह कार-गर रहा हूँ मैं
आख़िरश क्या है वो जो खोया नहीं
फिर ये किस डर से डर रहा हूँ मैं
— Mohit Subran















