"नहीं सोचा था"
हर इक दिन एक सा मौसम ही देखेंगे
नहीं सोचा था ये दिन हम भी देखेंगे
न होगा शख़्स कोई थामने को हाथ
फ़क़त तन्हाई के आलम ही देखेंगे
दिनों-दिन शब-ब-शब लम्हा-ब-लम्हा हम
ग़म-ओ-कर्ब-ओ-अलम हर दम ही देखेंगे
गला भर जाएगा लाचारियों में यूँ
कि दोनों आँख में शबनम सी देखेंगे
नसों का ख़ून भी कम होता जाएगा
जिगर भी दरहम-ओ-बरहम ही देखेंगे
गिरेंगी लड़खड़ा के धड़कनें सारी
बिखरती साँस की सरगम भी देखेंगे
नहीं था ये हमें अंदाज़ा हम इक दिन
ख़ुद अपनी मौत का मातम भी देखेंगे
— Mohit Subran















