अश्क हैं, कुछ सिसकियाँ हैं और टूटा दिल है इक
चीख़ हैं ख़ामोशियाँ हैं और टूटा दिल है इक
इन दिनों कुछ भी नहीं इन के अलावा हाए रे
हिज्र हैं वीरानियाँ हैं और टूटा दिल है इक
और क्या होगा भला उल्फ़त के मारे सीने में
ज़ख़्म हैं बर्बादियाँ हैं और टूटा दिल है इक
मुस्कुराहट खिलखिलाहट या ख़ुशी कुछ भी नहीं
रंज हैं बे-ज़ारियाँ हैं और टूटा दिल है इक
चंद चीज़ें ही बची हैं अब तो मेरे पास बस
यास हैं मजबूरियाँ हैं और टूटा दिल है इक
— Mohit Subran















