बर्बाद होती दुनिया

हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला
हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला

हर दिशा में एक सी आवाज़ का ही ज़ोर है
मार डालो काट डालो बस यही इक शोर है
जिस तरफ़ भी देखो तुम नफ़रत की अंधी भीड़ है
ख़ूँ ही सर पे ख़ूँ ही लब पे ख़ूँ की प्यासी भीड़ है
क्या हुआ इस को अचानक इस ने बदला रंग क्यूँ
और आख़िर हो गई जल्लाद दुनिया क्यूँ भला
हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला
हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला

युद्ध हो तो फिर निपटना चाहती है ढंग से
अब नहीं डरती ये दंगे या किसी भी जंग से
अब तो खुल के फूँकती है जंग का ही शंख ये
अम्न की जो बात की तो नोच लेगी पंख ये
सख़्त-दिल ज़ालिम सितम-गर जंगली क्यूँ हो गई
हो गई है इन दिनों सय्याद दुनिया क्यूँ भला
हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला
हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला

मारने में काटने में ज़ुल्म में मसरूफ़ है
जो भरा है ज़ेहन में उस ज़हर का ये रूप है
आएगी जब होश में होगी ख़बर जब क्या किया
रोएगी पछताएगी अपने किए पर देखना
नफ़रतें हैवानियत ज़ुल्म-ओ-सितम की बेड़ियाँ
तोड़ कर होती नहीं आज़ाद दुनिया क्यूँ भला
हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला
हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला

है अभी भी वक़्त चाहे तो सँभल सकती है ये
जो भरी नफ़रत है उल्फ़त में बदल सकती है ये
थूक सकती है ये विष लेकिन उगलती क्यूँ नहीं
चल रही जिस राह पे उस को बदलती क्यूँ नहीं
रंज-ओ-ग़म दर्द-ओ-अलम अश्कों का दामन छोड़ कर
आख़िरश होती नहीं पुर-शाद दुनिया क्यूँ भला
हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला
हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला

— Mohit Subran

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